सर्वं जनयति प्राणश्चेतोऽंशून्पुरुषः पृथक् ॥ ६ ॥
prabhavaḥ sarvabhāvānāṃ satāmiti viniścayaḥ .
sarvaṃ janayati prāṇaśceto’ṃśūnpuruṣaḥ pṛthak .. 6 ..
सत् अर्थात् अपने अविद्याकृत नामरूपात्मक मायिक स्वरूपसे विद्यमान विश्व, तैजस और प्राज्ञ भेदवाले सम्पूर्ण पदार्थों की उत्पत्ति हुआ करती है । आगे (प्रक० ३ का० २८ में) यह कहेंगे भी कि “वन्ध्यापुत्र न तो वस्तुतः और न मायासे ही उत्पन्न होता है ।” यदि असत् (स्वरूपसे अविद्यमान) पदार्थों की ही उत्पत्ति हुआ करती तो अव्यवहार्य ब्रह्म को ग्रहण करने का कोई मार्ग न रहनेसे उसकी असत्ता का प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता । अविद्याकृत मायामय बीजसे उत्पन्न हुए रज्जुसर्पादि की भी रज्जु आदिरूपसे सत्ता देखी गयी है । किसी भी पुरुषने निराश्रय रज्जुसर्प अथवा मृगतृष्णा आदि कभी नहीं देखे । जिस प्रकार सर्प की उत्पत्तिसे पूर्व वह रज्जु में रज्जुरूपसे सत् ही था उसी प्रकार समस्त पदार्थ अपनी उत्पत्तिसे पूर्व प्राणात्मक बीजरूपसे सत् ही थे । इसीसे श्रुति भी कहती है—“यह ब्रह्म ही है” “पहले यह आत्मा ही था” इत्यादि ।
सब पदार्थों को [बीजरूप] प्राण ही उत्पन्न करता है । तथा जो जल में प्रतिविम्बित सूर्य के समान देव, मनुष्य और तिर्यगादि विभिन्न शरीरों में प्राज्ञ, तैजस एवं विश्वरूपसे भासमान चिदात्मक पुरुष के किरणरूप चिदाभास हैं, उन विषयभावसे विलक्षण तथा अग्नि की चिनगारी और जल में प्रतिविम्बित सूर्य के समान सजातीय जीवों को पुरुष अलग ही उत्पन्न करता है । उनके सिवाय अन्य समस्त पदार्थों को बीजात्मक प्राण उत्पन्न करता है, जैसा कि “जिस प्रकार मकड़ी [जाला बनाती है]” तथा “जैसे अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ॥ ६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
सतां विद्यमानानां स्वेनाविद्याकृतनामरूपमायास्वरूपेण सर्वभावानां विश्वतैजसप्राज्ञभेदानां प्रभव उत्पत्तिः । वक्ष्यति च—“वन्ध्यापुत्रो न तत्त्वेन मायया वापि जायते” इति । यदि ह्यसतामेव जन्म स्याद्ब्रह्मणोऽव्यवहार्यस्य ग्रहणद्वाराभावादसत्त्वप्रसङ्गः । दृष्टं च रज्जुसर्पादीनामविद्याकृतमायाबीजोत्पन्नानां रज्ज्वाद्यात्मना सत्त्वम् । न हि निरास्पदा रज्जुसर्पमृगतृष्णिकादयः क्वचिदुपलभ्यन्ते केनचित् । यथा रज्ज्वां प्राक्सर्पोत्पत्तेरज्ज्वात्मना सर्पः सन्नेवासीत्, एवं सर्वभावानामुत्पत्तेः प्राक्प्राणबीजात्मनैव सत्त्वम् । इत्यतः श्रुतिरपि वक्ति—“ब्रह्मैवेदम्” (मु० उ० २ । २ । ११) “आत्मैवेदमग्र आसीत्” (बृ० उ० १ । ४ । १) इति ।
सर्वं जनयति प्राणश्चेतोऽंशूनंशव इव रवेश्चिदात्मकस्य पुरुषस्य चेतोरूपा जलार्कसमाः प्राज्ञतैजसविश्वभेदेन देवतिर्यगादिदेहभेदेषु विभाव्यमानाश्चेतोऽंशवो ये तान्पुरुषः पृथग्विषयभावविलक्षणानग्निविस्फुलिङ्गवत् सलक्षणाञ्जलार्कवच्च जीवलक्षणांस्त्वितरान् सर्वभावान् प्राणो बीजात्मा जनयति “यथोर्णनाभिः” (मु० उ० १ । १ । ७) “यथाग्नेः क्षुद्राविस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २ । १ । २०) इत्यादि श्रुतेः ॥ ६ ॥