स्वप्नमायासरूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिता ॥ ७ ॥
vibhūtiṃ prasavaṃ tvanye manyante sṛṣṭicintakāḥ .
svapnamāyāsarūpeti sṛṣṭiranyairvikalpitā .. 7 ..
यह सृष्टि ईश्वरकी विभूति यानी उसका विस्तार है—ऐसा सृष्टिके विषयमें विचार करनेवाले लोग मानते हैं । तात्पर्य यह है कि परमार्थचिन्तन करनेवालोंका सृष्टिके विषयमें आदर नहीं होता; जैसा कि “इन्द्र (परमात्मा) मायासे अनेक रूपवाला हो जाता है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है, [केवल बहिर्मुख पुरुष ही उसकी उत्पत्तिके विषयमें तरह-तरहकी कल्पना किया करते हैं] । आकाशमें सूत फेंककर उसपर शस्त्रोंसहित आरूढ़ हो नेत्रेन्द्रियकी पहुँचसे परे जाकर युद्धके द्वारा अनेकों टुकड़ोंमें विभक्त होकर गिरे हुए मायावीको पुनः उठता देखनेवाले पुरुषोंको उसकी रची हुई माया आदिके स्वरूपके चिन्तनमें आदर नहीं होता । उस मायावीके सूत्रविस्तारके समान ही ये सुषुप्ति एवं स्वप्नादिके विकास हैं; तथा उस (सूत्र)-पर चढ़े हुए मायावीके समान ही उन (सुषुप्ति आदि अवस्थाओं)-में स्थित प्राज्ञ एवं तैजस आदि हैं । किन्तु वास्तविक मायावी तो सूत्र और उसपर चढ़े हुए मायावीसे भिन्न है और वही जैसे मायासे आच्छादित रहनेके कारण दिखलायी न देता हुआ ही पृथिवीपर स्थित रहता है वैसा ही तुरीयसंज्ञक परमार्थ तत्त्व भी है । अतः मोक्षकामी आर्य पुरुषोंका उसीके चिन्तनमें आदर होता है । प्रयोजनहीन सृष्टिमें उनका आदर नहीं होता । अतः ये सब विकल्प सृष्टिका चिन्तन करनेवालोंके ही हैं; इसीसे कहा है—‘स्वप्नमायासरूपा इति’ अर्थात्
[दूसरे इसे] स्वप्नरूपा और मायारूपा [बतलाते हैं] ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
विभूतिर्विस्तार ईश्वरस्य सृष्टिरिति सृष्टिचिन्तका मन्यन्ते न तु परमार्थचिन्तकानां सृष्टावादर इत्यर्थः । “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते” (बृ० उ० २ । ५ । १९) इति श्रुतेः । न हि मायाविनं सूत्रमाकाशे निक्षिप्य तेन सायुधमारुह्य चक्षुर्गोचरतामतीत्य युद्धेन खण्डशश्छिन्नं पतितं पुनरुत्थितं च पश्यतां तत्कृतमायादिसतत्त्वचिन्तायामादरो भवति । तथैवायं मायाविनः सूत्रप्रसारणसमः सुषुप्तस्वप्नादिविकासस्तदारूढमायाविसमश्च तत्स्थः प्राज्ञतैजसादिः । सूत्रतदारूढाभ्यामन्यः परमार्थमायावी स एव भूमिष्ठो मायाछन्नोऽदृश्यमान एव स्थितो यथा तथा तुरीयाख्यं परमार्थतत्त्वम् । अतस्तच्चिन्तायामेवादरो मुमुक्षूणामार्याणां न निष्प्रयोजनायां सृष्टावादर इत्यतः सृष्टिचिन्तकानामेवैते विकल्पा इत्याह—स्वप्नमायासरूपेति ।
स्वप्नरूपा मायासरूपा चेति ॥ ७ ॥