आगम प्रकरण - कारिका 9

भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।
देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥ ९ ॥

bhogārthaṃ sṛṣṭirityanye krīḍārthamiti cāpare .
devasyaiṣa svabhāvo’yamāptakāmasya kā spṛhā .. 9 ..


कुछ लोग ‘सृष्टि भोगके लिये है’ ऐसा मानते हैं और कुछ ‘क्रीडाके लिये है’ ऐसा समझते हैं । [परन्तु वास्तवमें तो] यह भगवान्का स्वभाव ही है क्योंकि पूर्णकामको इच्छा ही क्या हो सकती है? ॥ ९ ॥
दूसरे लोग सृष्टिको ‘यह भोगार्थ अथवा क्रीडार्थ है’—ऐसा मानते हैं । ‘देवस्यैष स्वभावोऽयम्’ इस वाक्यसे देवके स्वभावपक्षका आश्रय लेकर इन दोनों पक्षोंको दोषयुक्त बतलाते हैं । अथवा ‘आप्तकामस्य का स्पृहा’ यह चौथा पाद सभी पक्षोंको दोषयुक्त बतलानेवाला है; क्योंकि अविद्यारूप अपने स्वभावके बिना रज्जु आदिका सर्पादिकी अभिव्यक्तिमें कारणत्व नहीं बतलाया जा सकता ॥ ९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें

भोगार्थं क्रीडार्थमिति चान्ये सृष्टिं मन्यन्ते । अनयोः पक्षयोर्दूषणं देवस्यैष स्वभावोऽयमिति देवस्य स्वभावपक्षमाश्रित्य, सर्वेषां वा पक्षाणामाप्तकामस्य का स्पृहेति ।

न हि रज्ज्वादीनामविद्यास्वभावव्यतिरेकेण सर्पाद्याभासत्वे कारणं शक्यं वक्तुम् ॥ ९ ॥


चतुर्थ पादका विवरण

अब क्रमसे प्राप्त हुआ चौथा पाद भी बतलाना है, अतः यही बात ‘नान्तःप्रज्ञम्’ इत्यादि मन्त्रसे कहते हैं । वह (चौथा पाद) सम्पूर्ण शब्दप्रवृत्तिके निमित्तसे रहित है, अतः शब्दसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । इसलिये श्रुति [अन्तःप्रज्ञत्व आदि] विशेष भावका प्रतिषेध करके ही उस तुरीयका निर्देश करनेमें प्रवृत्त होती है ।

पूर्व०—तब तो वह शून्यरूप ही हुआ ।

सिद्धान्ती—नहीं; क्योंकि मिथ्या विकल्पका बिना किसी निमित्तके होना सम्भव नहीं है । चाँदी, सर्प, पुरुष और मृगतृष्णा आदि विकल्प [क्रमशः] सीपी, रस्सी, ठूँठ और ऊसर आदिके बिना निराश्रय ही कल्पना नहीं किये जा सकते ।

पूर्व०—यदि ऐसी बात है तब तो प्राणादि सम्पूर्ण विकल्पका आश्रय होनेके कारण वह तुरीय शब्दका वाच्य सिद्ध होता है; जल के आधारभूत घट आदि के समान [अन्तःप्रज्ञत्वादिके] प्रतिषेधद्वारा उसकी प्रतीति नहीं करायी जा सकती ।

सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि शुक्ति आदि में प्रतीत होनेवाली चाँदी आदि के समान प्राणादि विकल्प असद्रूप है । तथा सत् और असत् का सम्बन्ध अवस्तुरूप होने के कारण शब्द की प्रवृत्ति का हेतु नहीं हो सकता; और न गौ आदि के समान वह स्वरूप से किसी अन्य प्रमाण का ही विषय हो सकता है, क्योंकि आत्मा उपाधिरहित है । इसी प्रकार अद्वितीयरूप होने के कारण सामान्य अथवा विशेष भाव का अभाव होने से उसमें गौ आदि के समान जातिमत्त्व भी नहीं है । और न अविकारी होने के कारण उसमें पाचकादि के समान क्रियावत्त्व तथा निर्गुण होने के कारण नीलता आदि के समान गुणवत्त्व ही है । इसलिये उसका किसी भी नाम से निर्देश नहीं किया जा सकता ।

पूर्व०—तब तो शशशृङ्गादि के समान [असद्रूप होने के कारण] उसकी निरर्थकता ही सिद्ध होती है ।

सिद्धान्ती—नहीं; क्योंकि शुक्ति का ज्ञान होने पर जिस प्रकार [उसमें आरोपित] चाँदी की तृष्णा नष्ट हो जाती है उसी प्रकार तुरीय हमारा आत्मा है—ऐसा ज्ञान होने पर वह अनात्मसम्बन्धिनी तृष्णा को निवृत्त करने का कारण होता है। तुरीय को अपना आत्मा जान लेने पर अविद्या एवं तृष्णादि दोषों की सम्भावना नहीं रहती। और तुरीय को अपने आत्मस्वरूप से न जानने का कोई कारण भी नहीं है, क्योंकि “तत्त्वमसि” “अयमात्मा ब्रह्म” “तत्सत्यं स आत्मा” “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” “आत्मैवेदग्ँ सर्वम्” इत्यादि समस्त उपनिषद्वाक्यों का पर्यवसान इसी अर्थ में हुआ है।

वह यह आत्मा परमार्थ और अपरमार्थरूप से चार पादवाला है—ऐसा कहा है। उसका बीजाङ्कुरस्थानीय पादत्रयस्वरूप अपरमार्थरूप रज्जुसर्पादि के समान अविद्याजनित कहा गया है। अब सर्पादिस्थानीय उक्त तीनों पादों का निराकरण कर ‘नान्तःप्रज्ञम्’ इत्यादि रूप से उसके रज्जुस्थानीय अबीजात्मक परमार्थस्वरूप का वर्णन करते हैं— पूर्व०—किन्तु आत्मा चार पादोंवाला है—ऐसी प्रतिज्ञा कर उसके तीन पादों का वर्णन कर देने से ही चौथे पाद का अन्तःप्रज्ञादि विशेषणों से भिन्न होना तो सिद्ध ही है; अतः यह “नान्तःप्रज्ञम्” इत्यादि प्रतिषेध तो व्यर्थ ही है ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें

चतुर्थः पादः क्रमप्राप्तो वक्तव्य इत्याह—नान्तःप्रज्ञमित्यादिना । सर्वशब्दप्रवृत्तिनिमित्तशून्यत्वात्तस्य शब्दानभिधेयत्वमिति विशेषप्रतिषेधेनैव च तुरीयं निर्दिदिक्षति ।

शून्यमेव तर्हि तत् ।

न; मिथ्याविकल्पस्य निर्निमित्तत्वानुपपत्तेः । न हि रजतसर्पपुरुषमृगतृष्णिकादिविकल्पाः शुक्तिकारज्जुस्थाणूषरादिव्यतिरेकेणावस्त्वास्पदाः शक्याःकल्पयितुम् ।

एवं तर्हि प्राणादिसर्वविकल्पास्पदत्वात्तुरीयस्य शब्दवाच्यत्वम् इति न प्रतिषेधैः प्रत्याय्यत्वम् उदकाधारादेरिव घटादेः ।

न; प्राणादिविकल्पस्यासत्त्वाच्छुक्तिकादिष्विव रजतादेः । न हि सदसतोः सम्बन्धः शब्दप्रवृत्तिनिमित्तभागवस्तुत्वात् । नापि प्रमाणान्तरविषयत्वं स्वरूपेण गवादिवत्; आत्मनो निरुपाधिकत्वात् । गवादिवन्नापि जातिमत्त्वमद्वितीयत्वेन सामान्यविशेषाभावात् । नापि क्रियावत्त्वं पाचकादिवदविक्रियत्वात् । नापि गुणवत्त्वं नीलादिवन्निर्गुणत्वात् । अतो नाभिधानेन निर्देशमर्हति ।

शशविषाणादिसमत्वान्निरर्थकत्वं तर्हि ।

न; आत्मत्वावगमे तुरीयतुरीयावगमस्य स्यानात्मतृष्णाव्यावृत्तिसार्थकत्वम् हेतुत्वाच्छुक्तिकावगम इव रजततृष्णायाः। न हि तुरीयस्यात्मत्वावगमे सत्यविद्यातृष्णादिदोषाणां सम्भवोऽस्ति। न च तुरीयस्यात्मत्वानवगमे कारणमस्ति; सर्वोपनिषदां तादर्थ्येनोपक्षयात्। “तत्त्वमसि” (छा० उ० ६।८।१६) “अयमात्मा ब्रह्म” (बृ० उ० २।५।१९)। “तत्सत्यं स आत्मा” (छा० उ० ६।८।१६) “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० उ० ३।४।१)। “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २।१।२) “आत्मैवेदग्ँसर्वम्” (छा० उ० ७।२५।२) इत्यादीनाम्।

सोऽयमात्मा परमार्थापरमार्थरूपश्चतुष्पादित्युक्तस्तस्यापरमार्थरूपमविद्याकृतं रज्जुसर्पादिसममुक्तं पादत्रयलक्षणं बीजाङ्कुरस्थानीयम्। अथेदानीमबीजात्मकं परमार्थस्वरूपं रज्जुस्थानीयं सर्पादिस्थानीयोक्तस्थानत्रयनिराकरणेनाह—नान्तःप्रज्ञमित्यादि। नन्वात्मनश्चतुष्पात्त्वं प्रतिज्ञाय पादत्रयकथनेनैव चतुर्थस्यान्तःप्रज्ञादिभ्योऽन्यत्वे सिद्धे नान्तःप्रज्ञमित्यादिप्रतिषेधोऽनर्थकः ।