देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा ॥ ९ ॥
bhogārthaṃ sṛṣṭirityanye krīḍārthamiti cāpare .
devasyaiṣa svabhāvo’yamāptakāmasya kā spṛhā .. 9 ..
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भोगार्थं क्रीडार्थमिति चान्ये सृष्टिं मन्यन्ते । अनयोः पक्षयोर्दूषणं देवस्यैष स्वभावोऽयमिति देवस्य स्वभावपक्षमाश्रित्य, सर्वेषां वा पक्षाणामाप्तकामस्य का स्पृहेति ।
न हि रज्ज्वादीनामविद्यास्वभावव्यतिरेकेण सर्पाद्याभासत्वे कारणं शक्यं वक्तुम् ॥ ९ ॥
चतुर्थ पादका विवरण
अब क्रमसे प्राप्त हुआ चौथा पाद भी बतलाना है, अतः यही बात ‘नान्तःप्रज्ञम्’ इत्यादि मन्त्रसे कहते हैं । वह (चौथा पाद) सम्पूर्ण शब्दप्रवृत्तिके निमित्तसे रहित है, अतः शब्दसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता । इसलिये श्रुति [अन्तःप्रज्ञत्व आदि] विशेष भावका प्रतिषेध करके ही उस तुरीयका निर्देश करनेमें प्रवृत्त होती है ।
पूर्व०—तब तो वह शून्यरूप ही हुआ ।
सिद्धान्ती—नहीं; क्योंकि मिथ्या विकल्पका बिना किसी निमित्तके होना सम्भव नहीं है । चाँदी, सर्प, पुरुष और मृगतृष्णा आदि विकल्प [क्रमशः] सीपी, रस्सी, ठूँठ और ऊसर आदिके बिना निराश्रय ही कल्पना नहीं किये जा सकते ।
पूर्व०—यदि ऐसी बात है तब तो प्राणादि सम्पूर्ण विकल्पका आश्रय होनेके कारण वह तुरीय शब्दका वाच्य सिद्ध होता है; जल के आधारभूत घट आदि के समान [अन्तःप्रज्ञत्वादिके] प्रतिषेधद्वारा उसकी प्रतीति नहीं करायी जा सकती ।
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि शुक्ति आदि में प्रतीत होनेवाली चाँदी आदि के समान प्राणादि विकल्प असद्रूप है । तथा सत् और असत् का सम्बन्ध अवस्तुरूप होने के कारण शब्द की प्रवृत्ति का हेतु नहीं हो सकता; और न गौ आदि के समान वह स्वरूप से किसी अन्य प्रमाण का ही विषय हो सकता है, क्योंकि आत्मा उपाधिरहित है । इसी प्रकार अद्वितीयरूप होने के कारण सामान्य अथवा विशेष भाव का अभाव होने से उसमें गौ आदि के समान जातिमत्त्व भी नहीं है । और न अविकारी होने के कारण उसमें पाचकादि के समान क्रियावत्त्व तथा निर्गुण होने के कारण नीलता आदि के समान गुणवत्त्व ही है । इसलिये उसका किसी भी नाम से निर्देश नहीं किया जा सकता ।
पूर्व०—तब तो शशशृङ्गादि के समान [असद्रूप होने के कारण] उसकी निरर्थकता ही सिद्ध होती है ।
सिदà¥à¤§à¤¾à¤¨à¥à¤¤à¥€â€”नहीं; कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि शà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ का जà¥à¤žà¤¾à¤¨ होने पर जिस पà¥à¤°à¤•ार [उसमें आरोपित] चाà¤à¤¦à¥€ की तृषà¥à¤£à¤¾ नषà¥à¤Ÿ हो जाती है उसी पà¥à¤°à¤•ार तà¥à¤°à¥€à¤¯ हमारा आतà¥à¤®à¤¾ है—à¤à¤¸à¤¾ जà¥à¤žà¤¾à¤¨ होने पर वह अनातà¥à¤®à¤¸à¤®à¥à¤¬à¤¨à¥à¤§à¤¿à¤¨à¥€ तृषà¥à¤£à¤¾ को निवृतà¥à¤¤ करने का कारण होता है। तà¥à¤°à¥€à¤¯ को अपना आतà¥à¤®à¤¾ जान लेने पर अविदà¥à¤¯à¤¾ à¤à¤µà¤‚ तृषà¥à¤£à¤¾à¤¦à¤¿ दोषों की समà¥à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ नहीं रहती। और तà¥à¤°à¥€à¤¯ को अपने आतà¥à¤®à¤¸à¥à¤µà¤°à¥‚प से न जानने का कोई कारण à¤à¥€ नहीं है, कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि “ततà¥à¤¤à¥à¤µà¤®à¤¸à¤¿â€ “अयमातà¥à¤®à¤¾ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®â€ “ततà¥à¤¸à¤¤à¥à¤¯à¤‚ स आतà¥à¤®à¤¾â€ “यतà¥à¤¸à¤¾à¤•à¥à¤·à¤¾à¤¦à¤ªà¤°à¥‹à¤•à¥à¤·à¤¾à¤¦à¥à¤¬à¥à¤°à¤¹à¥à¤®â€ “सबाहà¥à¤¯à¤¾à¤à¥à¤¯à¤¨à¥à¤¤à¤°à¥‹ हà¥à¤¯à¤œà¤ƒâ€ “आतà¥à¤®à¥ˆà¤µà¥‡à¤¦à¤—à¥à¤ सरà¥à¤µà¤®à¥â€ इतà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¿ समसà¥à¤¤ उपनिषदà¥à¤µà¤¾à¤•à¥à¤¯à¥‹à¤‚ का परà¥à¤¯à¤µà¤¸à¤¾à¤¨ इसी अरà¥à¤¥ में हà¥à¤† है।
वह यह आतà¥à¤®à¤¾ परमारà¥à¤¥ और अपरमारà¥à¤¥à¤°à¥‚प से चार पादवाला है—à¤à¤¸à¤¾ कहा है। उसका बीजाङà¥à¤•à¥à¤°à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯ पादतà¥à¤°à¤¯à¤¸à¥à¤µà¤°à¥‚प अपरमारà¥à¤¥à¤°à¥‚प रजà¥à¤œà¥à¤¸à¤°à¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¿ के समान अविदà¥à¤¯à¤¾à¤œà¤¨à¤¿à¤¤ कहा गया है। अब सरà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¿à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯ उकà¥à¤¤ तीनों पादों का निराकरण कर ‘नानà¥à¤¤à¤ƒà¤ªà¥à¤°à¤œà¥à¤žà¤®à¥â€™ इतà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¿ रूप से उसके रजà¥à¤œà¥à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯ अबीजातà¥à¤®à¤• परमारà¥à¤¥à¤¸à¥à¤µà¤°à¥‚प का वरà¥à¤£à¤¨ करते हैं— पूर्व०—किन्तु आत्मा चार पादोंवाला है—ऐसी प्रतिज्ञा कर उसके तीन पादों का वर्णन कर देने से ही चौथे पाद का अन्तःप्रज्ञादि विशेषणों से भिन्न होना तो सिद्ध ही है; अतः यह “नान्तःप्रज्ञम्” इत्यादि प्रतिषेध तो व्यर्थ ही है ।
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चतुर्थः पादः क्रमप्राप्तो वक्तव्य इत्याह—नान्तःप्रज्ञमित्यादिना । सर्वशब्दप्रवृत्तिनिमित्तशून्यत्वात्तस्य शब्दानभिधेयत्वमिति विशेषप्रतिषेधेनैव च तुरीयं निर्दिदिक्षति ।
शून्यमेव तर्हि तत् ।
न; मिथ्याविकल्पस्य निर्निमित्तत्वानुपपत्तेः । न हि रजतसर्पपुरुषमृगतृष्णिकादिविकल्पाः शुक्तिकारज्जुस्थाणूषरादिव्यतिरेकेणावस्त्वास्पदाः शक्याःकल्पयितुम् ।
एवं तर्हि प्राणादिसर्वविकल्पास्पदत्वात्तुरीयस्य शब्दवाच्यत्वम् इति न प्रतिषेधैः प्रत्याय्यत्वम् उदकाधारादेरिव घटादेः ।
न; प्राणादिविकल्पस्यासत्त्वाच्छुक्तिकादिष्विव रजतादेः । न हि सदसतोः सम्बन्धः शब्दप्रवृत्तिनिमित्तभागवस्तुत्वात् । नापि प्रमाणान्तरविषयत्वं स्वरूपेण गवादिवत्; आत्मनो निरुपाधिकत्वात् । गवादिवन्नापि जातिमत्त्वमद्वितीयत्वेन सामान्यविशेषाभावात् । नापि क्रियावत्त्वं पाचकादिवदविक्रियत्वात् । नापि गुणवत्त्वं नीलादिवन्निर्गुणत्वात् । अतो नाभिधानेन निर्देशमर्हति ।
शशविषाणादिसमत्वान्निरर्थकत्वं तर्हि ।
न; आतà¥à¤®à¤¤à¥à¤µà¤¾à¤µà¤—मे तà¥à¤°à¥€à¤¯à¤¤à¥à¤°à¥€à¤¯à¤¾à¤µà¤—मसà¥à¤¯ सà¥à¤¯à¤¾à¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¤à¥ƒà¤·à¥à¤£à¤¾à¤µà¥à¤¯à¤¾à¤µà¥ƒà¤¤à¥à¤¤à¤¿à¤¸à¤¾à¤°à¥à¤¥à¤•तà¥à¤µà¤®à¥ हेतà¥à¤¤à¥à¤µà¤¾à¤šà¥à¤›à¥à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤•ावगम इव रजततृषà¥à¤£à¤¾à¤¯à¤¾à¤ƒà¥¤ न हि तà¥à¤°à¥€à¤¯à¤¸à¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¤à¥à¤µà¤¾à¤µà¤—मे सतà¥à¤¯à¤µà¤¿à¤¦à¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥ƒà¤·à¥à¤£à¤¾à¤¦à¤¿à¤¦à¥‹à¤·à¤¾à¤£à¤¾à¤‚ समà¥à¤à¤µà¥‹à¤½à¤¸à¥à¤¤à¤¿à¥¤ न च तà¥à¤°à¥€à¤¯à¤¸à¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¤à¥à¤µà¤¾à¤¨à¤µà¤—मे कारणमसà¥à¤¤à¤¿; सरà¥à¤µà¥‹à¤ªà¤¨à¤¿à¤·à¤¦à¤¾à¤‚ तादरà¥à¤¥à¥à¤¯à¥‡à¤¨à¥‹à¤ªà¤•à¥à¤·à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¥¤ “ततà¥à¤¤à¥à¤µà¤®à¤¸à¤¿â€ (छा० उ० ६।८।१६) “अयमातà¥à¤®à¤¾ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®â€ (बृ० उ० २।५।१९)। “ततà¥à¤¸à¤¤à¥à¤¯à¤‚ स आतà¥à¤®à¤¾â€ (छा० उ० ६।८।१६) “यतà¥à¤¸à¤¾à¤•à¥à¤·à¤¾à¤¦à¤ªà¤°à¥‹à¤•à¥à¤·à¤¾à¤¦à¥à¤¬à¥à¤°à¤¹à¥à¤®â€ (बृ० उ० ३।४।१)। “सबाहà¥à¤¯à¤¾à¤à¥à¤¯à¤¨à¥à¤¤à¤°à¥‹ हà¥à¤¯à¤œà¤ƒâ€ (मà¥à¥¦ उ० २।१।२) “आतà¥à¤®à¥ˆà¤µà¥‡à¤¦à¤—à¥à¤à¤¸à¤°à¥à¤µà¤®à¥â€ (छा० उ० à¥à¥¤à¥¨à¥«à¥¤à¥¨) इतà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¥€à¤¨à¤¾à¤®à¥à¥¤
सोऽयमातà¥à¤®à¤¾ परमारà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤°à¤®à¤¾à¤°à¥à¤¥à¤°à¥‚पशà¥à¤šà¤¤à¥à¤·à¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¿à¤¤à¥à¤¯à¥à¤•à¥à¤¤à¤¸à¥à¤¤à¤¸à¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤°à¤®à¤¾à¤°à¥à¤¥à¤°à¥‚पमविदà¥à¤¯à¤¾à¤•ृतं रजà¥à¤œà¥à¤¸à¤°à¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¿à¤¸à¤®à¤®à¥à¤•à¥à¤¤à¤‚ पादतà¥à¤°à¤¯à¤²à¤•à¥à¤·à¤£à¤‚ बीजाङà¥à¤•à¥à¤°à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯à¤®à¥à¥¤ अथेदानीमबीजातà¥à¤®à¤•ं परमारà¥à¤¥à¤¸à¥à¤µà¤°à¥‚पं रजà¥à¤œà¥à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯à¤‚ सरà¥à¤ªà¤¾à¤¦à¤¿à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯à¥‹à¤•à¥à¤¤à¤¸à¥à¤¥à¤¾à¤¨à¤¤à¥à¤°à¤¯à¤¨à¤¿à¤°à¤¾à¤•रणेनाह—नानà¥à¤¤à¤ƒà¤ªà¥à¤°à¤œà¥à¤žà¤®à¤¿à¤¤à¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¿à¥¤ नन्वात्मनश्चतुष्पात्त्वं प्रतिज्ञाय पादत्रयकथनेनैव चतुर्थस्यान्तःप्रज्ञादिभ्योऽन्यत्वे सिद्धे नान्तःप्रज्ञमित्यादिप्रतिषेधोऽनर्थकः ।