अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७ ॥
nāntaḥprajñaṃ na bahiṣprajñaṃ nobhayataḥprajñaṃ na prajñānaghanaṃ na prajñaṃ nāprajñam .
adṛṣṭamavyavahāryamagrāhyamalakṣaṇamacintyamavyapadeśyamekātmapratyayasāraṃ prapañcopaśamaṃ śāntaṃ śivamadvaitaṃ caturthaṃ manyante sa ātmā sa vijñeyaḥ .. 7 ..
सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार सर्पादि विकल्प का प्रतिषेध करने से ही रज्जु के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है उसी प्रकार, जैसा कि “तत्त्वमसि” इत्यादि वाक्य में देखा जाता है, यहाँ [जाग्रदादि] तीनों अवस्थाओं में स्थित आत्मा का ही तुरीयरूप से प्रतिपादन करना इष्ट है ।
यदि तुरीय आत्मा अवस्थात्रयविशिष्ट आत्मा से सर्वथा भिन्न होता तो उसकी उपलब्धि का कोई उपाय न रहने के कारण शास्त्रोपदेश की व्यर्थता अथवा शून्यवाद की प्राप्ति हो जाती । जब कि सर्पादि (सर्प, धारा, भूच्छिद्रादि)-रूप से विकल्पित रज्जु के समान [जाग्रदादि] तीनों स्थानों में एक ही आत्मा अन्तः-प्रज्ञादिरूप से विकल्पित हो रहा है तब तो अन्तःप्रज्ञत्वादि के प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाण की उत्पत्ति के समकाल ही आत्मा में अनर्थप्रपञ्च की निवृत्तिरूप फल सिद्ध हो जाता है; अतः तुरीय का साक्षात्कार करने के लिये इसके सिवा किसी अन्य प्रमाण अथवा साधन की खोज करने की आवश्यकता नहीं है; जैसे कि रज्जु और सर्प का विवेक होने के समानकाल में ही रज्जु में सर्पनिवृत्तिरूप फल की प्राप्ति होते ही रज्जु का ज्ञान हो जाता है [उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये] ।
किन्तु जिनके मत में घटज्ञान में अन्धकार की निवृत्ति के सिवा किसी और कार्य में भी प्रमाण की प्रवृत्ति होती है उनका तो मानो ऐसा कथन है कि छेद्य पदार्थों के अवयवों का सम्बन्धविच्छेद करने के अतिरिक्त भी छेदनक्रिया का वस्तु के किसी एक अवयव में कोई व्यापार होता है ।
छेद्य अवयवों का सम्बन्धच्छेद करने में प्रवृत्त छेदनक्रिया जिस प्रकार उसके अवयवों के विभक्त हो जाने में समाप्त होनेवाली है उसी प्रकार जब कि घट और अन्धकार का पार्थक्य करने में प्रवृत्त प्रमाण अनिष्ट अन्धकार की निवृत्तिरूप फल में ही समाप्त हो जानेवाला है तब घटज्ञान तो अवश्यम्भावी है, वह प्रमाण का फल नहीं है ।
उसी के समान आत्मा में आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादि के विवेक करने में प्रवृत्त प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाण का, अनुपादित्सित (जिसका स्वीकार करना इष्ट नहीं है उस) अन्तःप्रज्ञत्वादि की निवृत्ति के सिवा तुरीय आत्मा में कोई अन्य व्यापार होना सम्भव नहीं है, क्योंकि अन्तःप्रज्ञत्वादि की निवृत्ति के समकाल में ही प्रमातृत्वादि भेद की निवृत्ति हो जाती है । ऐसा ही “ज्ञान हो जाने पर द्वैत नहीं रहता” इत्यादि वाक्यद्वारा आगे कहेंगे भी; क्योंकि वृत्तिज्ञान की भी स्थिति द्वैतनिवृत्ति के क्षण के सिवा दूसरे क्षण में नहीं रहती; और यदि स्थिति मानी जाय तो अनवस्था का प्रसङ्ग उपस्थित हो जाने से द्वैत की निवृत्ति ही नहीं होगी । अतः यह सिद्ध हुआ कि प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाण के प्रवृत्त होने के समकाल में ही आत्मा में आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादि अनर्थ की निवृत्ति हो जाती है ।
‘अन्तःप्रज्ञ नहीं है’ ऐसा कहकर तैजस का प्रतिषेध किया है; ‘बहिष्प्रज्ञ नहीं है’ इससे विश्व का निषेध किया है; ‘उभयतःप्रज्ञ नहीं है’ इस वाक्य से जाग्रत् और स्वप्न के बीच की अवस्था का प्रतिषेध किया है; ‘प्रज्ञानघन नहीं है’ इससे सुषुप्ति का प्रतिषेध हुआ है, क्योंकि वह बीजभावमय-अविवेकस्वरूपा है; ‘प्रज्ञ नहीं है’ इससे एक साथ सब विषयों के ज्ञातृत्व का प्रतिषेध किया है; तथा ‘अप्रज्ञ नहीं है’ इससे अचेतनता का निषेध किया है ।
किन्तु जब कि अन्तःप्रज्ञत्वादि धर्म आत्मा में प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं तो केवल प्रतिषेध के ही कारण उनका रज्जु में प्रतीत होनेवाले सर्पादि के समान असत्यत्व कैसे सिद्ध हो सकता है? इस पर कहते हैं—रज्जु आदि में प्रतीत होनेवाले सर्प, धारा आदि विकल्पभेदों के समान उनके चित्स्वरूप में कोई भेद न होने पर भी परस्पर एक-दूसरे का व्यभिचार होने के कारण वे असद्रूप हैं । किन्तु चित्स्वरूप का कहीं भी व्यभिचार नहीं है; इसलिये वह सत्य है ।
यदि कहो कि सुषुप्ति में उसका व्यभिचार होता है तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि सुषुप्ति का भी अनुभव हुआ करता है; जैसा कि “विज्ञाता की विज्ञाति का लोप नहीं होता” इस श्रुति से सिद्ध होता है ।
इसीलिये वह अदृश्य है । और क्योंकि अदृश्य है इसलिये अव्यवहार्य है तथा कर्मेन्द्रियों से अग्राह्य और अलक्षण यानी लिङ्गरहित है । तात्पर्य यह है कि उसका अनुमान नहीं किया जा सकता । इसी से वह अचिन्त्य है अतएव शब्दों द्वारा अकथनीय है । वह एकात्मप्रत्ययसार है । अर्थात् जाग्रत् आदि स्थानों में एक ही आत्मा है—ऐसा जो अव्यभिचारी प्रत्यय है उससे अनुसरण किये जानेयोग्य है । अथवा “आत्मा है—इस प्रकार ही उपासना करे” इस श्रुति के अनुसार जिस तुरीय का ज्ञान प्राप्त करने में एक आत्मप्रत्यय ही सार यानी प्रमाण है वह तुरीय एकात्मप्रत्ययसार है ।
अन्तःप्रज्ञत्वादि स्थानियों (जाग्रत् आदि अवस्थाओं के अभिमानियों) के धर्मों का प्रतिषेध किया गया, अब ‘प्रपञ्चोपशमम्’ इत्यादि से जाग्रत् आदि स्थानों (अवस्थाओं) के धर्मों का अभाव बतलाया जाता है । इसीलिये वह शान्त यानी अविकारी है; और क्योंकि वह अद्वैत अर्थात् भेदरूप विकल्प से रहित है, इसलिये शिव है । उसे चतुर्थ यानी तुरीय मानते हैं; क्योंकि यह प्रतीत होनेवाले पूर्वोक्त तीन पादों से विलक्षण है । वही आत्मा है और वही ज्ञातव्य है । अतः जिस प्रकार रज्जु अपने में प्रतीत होनेवाले सर्प, दण्ड और भूच्छिद्र आदि से सर्वथा भिन्न है उसी प्रकार ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि वाक्यों का अर्थस्वरूप आत्मा, जिसका कि “अदृश्य होकर भी देखनेवाला है” “द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता” इत्यादि श्रुतियों ने प्रतिपादन किया है, [अपने में अध्यस्त जाग्रदादि अवस्थाओं से सर्वथा भिन्न है ।] वही ज्ञातव्य है—ऐसा भूतपूर्वगति से[ * ] कहा जाता है, क्योंकि उसका ज्ञान होने पर द्वैत का अभाव हो जाता है ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
न; सर्पादिविकल्पप्रतिषेधेनैव आत्मावगतौ रज्जुस्वरूपप्रतिपत्तिअनात्मप्रतिषेध वद्व्यवस्थस्यैवात्मनएव प्रमाणम् स्तुरीयत्वेन प्रतिपिपादयिषितत्वात्; तत्त्वमसीतिवत् । यदि हि त्र्यवस्थात्मविलक्षणं तुरीयमन्यत्तत्प्रतिपत्तिद्वाराभावा- च्छास्त्रोपदेशानर्थक्यं शून्यतापत्तिर्वा । रज्जुरिव सर्पादिभिर्विकल्प्यमाना स्थानत्रयेऽप्यात्मैक एवान्तःप्रज्ञादित्वेन विकल्प्यते यदा तदान्तःप्रज्ञत्वादिप्रतिषेधविज्ञानप्रमाणसमकालमेवात्मन्यनर्थप्रपञ्चनिवृत्तिलक्षणफलं परिसमाप्तम्, इति तुरीयाधिगमे प्रमाणान्तरं साधनान्तरं वा न मृग्यम् । रज्जुसर्पविवेकसमकाल इव रज्ज्वां सर्पनिवृत्तिफले सति रज्ज्वाधिगमस्य ।
येषां पुनस्तमोऽपनयव्यतिरेकेण घटाधिगमे प्रमाणं व्याप्रियते तेषां छेद्यावयवसम्बन्धवियोग- व्यतिरेकेणान्यतरावयवेऽपिच्छिदिव्याप्रियत इत्युक्तं स्यात् ।
यदा पुनर्घटतमसोर्विवेककरणे प्रवृत्तं प्रमाणमनुपादित्सिततमोनिवृत्तिफलावसानं छिदिरिवच्छेद्यावयवसम्बन्धविवेककरणे प्रवृत्ता तदवयवद्वैधीभावफलावसाना तदा नान्तरीयकं घटविज्ञानं न तत्प्रमाणफलम् ।
न च तद्वदप्यात्मन्यध्यारोपितान्तःप्रज्ञत्वादिविवेककरणे प्रवृत्तस्य प्रतिषेधविज्ञानप्रमाणस्य अनुपादित्सितान्तःप्रज्ञत्वादिनिवृत्तिव्यतिरेकेण तुरीये व्यापारोपपत्तिः ।
अन्तःप्रज्ञत्वादिनिवृत्तिसमकालमेव प्रमातृत्वादिभेदनिवृत्तेः । तथा च वक्ष्यति—“ज्ञाते द्वैतं न विद्यते” (माण्डू० का० १ ।१८) इति । ज्ञानस्य द्वैतनिवृत्तिक्षणव्यतिरेकेण क्षणान्तरानवस्थानात् । अवस्थाने चानवस्थाप्रसङ्गादद्वैतानिवृत्तिः । तस्मात्प्रतिषेधविज्ञानप्रमाणव्यापारसमकालैवात्मन्यध्यारोपितान्तःप्रज्ञत्वाद्यनर्थनिवृत्तिरिति सिद्धम् ।
नान्तःप्रज्ञमिति तैजसप्रतिषेधः । न बहिष्प्रज्ञमिति विश्वप्रतिषेधः । नोभयतःप्रज्ञमिति जाग्रत्स्वप्नयोः । अन्तरालावस्थाप्रतिषेधः । न प्रज्ञानघनमिति सुषुप्तावस्थाप्रतिषेधः । बीजभावाविवेकरूपत्वात् । न प्रज्ञमिति युगपत्सर्वविषयप्रज्ञातृत्वप्रतिषेधः । नाप्रज्ञमित्यचैतन्यप्रतिषेधः ।
कथं पुनरन्तःप्रज्ञत्वादीनामात्मनि गम्यमानानां रज्ज्वादौ सर्पादिवत्प्रतिषेधादसत्त्वं गम्यत इत्युच्यते । ज्ञस्वरूपाविशेषेऽपि इतरेतरव्यभिचाराद्रज्ज्वादाविव सर्पधारादिविकल्पितभेदवत् सर्वत्राव्यभिचाराज्ञस्वरूपस्य सत्यत्वम् ।
सुषुप्ते व्यभिचरतीति चेन्न । सुषुप्तस्यानुभूयमानत्वात् । “न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४ ।३ ।३०) इति श्रुतेः ।
अत एवादृष्टम् । यस्माददृष्टं तस्मादव्यवहार्यम् । अग्राह्यं कर्मेन्द्रियैः । अलक्षणमलिङ्गमित्येतदननुमेयमित्यर्थः । अत एवाचिन्त्यम् । अत एवाव्यपदेश्यं शब्दैः । एकात्मप्रत्ययसारं जाग्रदादिस्थानेष्वेकोऽयमात्मेत्यव्यभिचारी यः प्रत्ययस्तेनानुसरणीयम् । अथवैक आत्मप्रत्ययः सारं प्रमाणं यस्य तुरीयस्याधिगमे तत्तुरीयमेकात्मप्रत्ययसारम् । “आत्मेत्येवोपासीत” (बृ० उ० १ ।४ ।७) इति श्रुतेः ।
अन्तःप्रज्ञत्वादिस्थानिधर्मप्रतिषेधः कृतः । प्रपञ्चोपशममिति जाग्रदादिस्थानधर्माभाव उच्यते । अत एव शान्तमविक्रियम्, शिवं यतोऽद्वैतं भेदविकल्परहितम् । चतुर्थं तुरीयं मन्यन्ते; प्रतीयमानपादत्रयरूपवैलक्षण्यात् । स आत्मा स विज्ञेय इति प्रतीयमानसर्पभूच्छिद्रदण्डादिव्यतिरिक्ता यथा रज्जुस्तथा तत्त्वमसीत्यादिवाक्यार्थ आत्मा “अदृष्टो द्रष्टा” (बृ० उ० ३ ।७ ।२३) “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४ ।३ ।२३) इत्यादिभिरुक्तो यः । स विज्ञेय इति भूतपूर्वगत्या; ज्ञाते द्वैताभावः ॥ ७ ॥
तुरीय का प्रभाव
अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थ में ये श्लोक हैं—
तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अन्धकार में रहते हुए घट का ज्ञान प्राप्त करने के लिये अन्धकार की निवृत्तिमात्र ही आवश्यक है, अन्य किसी क्रिया की अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार तुरीय का ज्ञान प्राप्त करने के लिये उसमें आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादि का निषेध ही कर्तव्य है । जो लोग घटज्ञान में अन्धकार-निवृत्ति के सिवा उसके उत्पादक प्रमाण का कोई और व्यापार भी स्वीकार करते हैं वे मानो ऐसा कहते हैं कि छेदनक्रिया छेद्यपदार्थ के अवयवों का सम्बन्धच्छेद करने के सिवा उसके किसी भी अवयव में कोई अन्य कार्य भी कर देती है । परन्तु यह बात सर्वसम्मत है कि छेदनक्रिया का अवयवविश्लेषण के सिवा कोई अन्य व्यापार नहीं होता । इसीलिये उनका कथन माननीय नहीं है । यदि प्रमाण अज्ञान का ही निवर्तक है तो विषय के स्फुरण होने का तो कोई कारण दिखायी नहीं देता; अतः विषयज्ञान होना ही नहीं चाहिये—ऐसी आशङ्का करके आगे की बात कहते हैं । अद्वैत-बोध के लिये जिन-जिन प्रमाणों का आश्रय लिया जाता है वे सब द्वैतप्रपञ्च के ही अन्तर्गत हैं । निखिलद्वैत की निवृत्ति करनेवाला वृत्तिज्ञान भी वृत्तिरूप होने के कारण द्वैत के ही अन्तर्गत है । यदि वह सम्पूर्ण द्वैत की निवृत्ति करके भी बना रहे तो उसकी निवृत्ति के लिये किसी अन्य वृत्ति की अपेक्षा होगी और उसके लिये किसी तीसरी की । इस प्रकार अनवस्था-दोष उपस्थित हो जायगा और द्वैत की निवृत्ति कभी न हो पावेगी । इसलिये निखिलद्वैत की निवृत्ति करने के उत्तर-क्षण में ही वृत्तिज्ञान स्वयं भी निवृत्त हो जाता है—यही मत समीचीन है ।