आगम प्रकरण - कारिका 10

निवृत्ते सर्वदुःखानामीशानः प्रभुरव्ययः ।
अद्वैतः सर्वभावानां देवस्तुर्यो विभुः स्मृतः ॥ १० ॥

nivṛtte sarvaduḥkhānāmīśānaḥ prabhuravyayaḥ .
advaitaḥ sarvabhāvānāṃ devasturyo vibhuḥ smṛtaḥ .. 10 ..


तुरीय आत्मा सब प्रकार के दुःखों की निवृत्ति में ईशान—प्रभु (समर्थ) है । वह अविकारी, सब पदार्थों का अद्वैतरूप, देव, तुरीय और व्यापक माना गया है ॥ १० ॥

तुरीय आत्मा प्राज्ञ, तैजस और विश्वरूप समस्त दुःखों की निवृत्ति में ईशान है । ‘ईशान’ इस पद की व्याख्या ‘प्रभु’ है । तात्पर्य यह है कि वह दुःखनिवृत्ति में समर्थ है, क्योंकि उसका विज्ञान दुःखनिवृत्ति का कारण है ।

अव्यय—जो व्यय (विकार) को प्राप्त नहीं होता; अर्थात् जो स्वरूप से व्यभिचरित यानी च्युत नहीं होता । क्यों च्युत नहीं होता? क्योंकि वह अद्वैत है । अन्य सब पदार्थ रज्जु में अध्यस्त सर्प के समान मिथ्या हैं; इसलिये प्रकाशनशील होने के कारण वह यह देव तुर्य यानी चतुर्थ और विभु यानी व्यापक माना गया है ॥ १० ॥

[ * ]: अर्थात् अविद्यावस्था में आत्मा में जो ज्ञेयत्व मान रखा था उसी का आश्रय लेकर तुरीय को ‘ज्ञातव्य’ कहा जाता है । वास्तव में तो जो अव्यवहार्य और अप्रमेय है उसे ज्ञातव्य भी नहीं कहा जा सकता ।

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प्राज्ञतैजसविश्वलक्षणानां सर्वदुःखानां निवृत्तेरीशानस्तुरीय आत्मा । ईशान इत्यस्य पदस्य व्याख्यानं प्रभुरिति । दुःखनिवृत्तिं प्रति प्रभुर्भवतीत्यर्थः । तद्विज्ञाननिमित्तत्वाद्दुःखनिवृत्तेः ।

अव्ययो न व्येति स्वरूपान्न व्यभिचरतीति यावत् । एतत्कुतः, यस्मादद्वैतः । सर्वभावानां रज्जुसर्पवन्मृषात्वात्स एष देवो द्योतनात्तुरीयश्चतुर्थो विभुर्व्यापी स्मृतः ॥ १० ॥


विश्व और तैजस से तुरीय का भेद

तुरीय का यथार्थ स्वरूप समझने के लिये विश्व आदि के सामान्य और विशेष भाव का निरूपण किया जाता है—
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विश्वादीनां सामान्यविशेषभावो निरूप्यते तुर्ययाथात्म्यावधारणार्थम्—