सर्वान्नेतान् पुनरपि शनैः स्वात्मनि स्थापयित्वा हित्वा सर्वान् विशेषान् विगतगुणगणः पात्वसौ नस्तुरीयः ॥ २ ॥
yo viśvātmā vidhijaviṣayān prāśya bhogān sthaviṣṭhān paścāccānyān svamativibhavān jyotiṣā svena sūkṣmān .
sarvānnetān punarapi śanaiḥ svātmani sthāpayitvā hitvā sarvān viśeṣān vigataguṇagaṇaḥ pātvasau nasturīyaḥ .. 2 ..
सम्बन्ध-भाष्य
‘ॐ’ यह अक्षर ही यह सब कुछ है । उसका व्याख्यानरूप तथा वेदान्तार्थ का सारसंग्रहभूत यह चार प्रकरणोंवाला ग्रन्थ ‘ओमित्येतदक्षरमिदम्’ आदि मन्त्रद्वारा आरम्भ किया जाता है । इसीलिये इसके सम्बन्ध, विषय और प्रयोजन का पृथक् वर्णन करने की आवश्यकता नहीं है । वेदान्तशास्त्र में जो-जो सम्बन्ध, विषय और प्रयोजन हुआ करते हैं वे ही इस ग्रन्थ में भी हो सकते हैं । तो भी [व्याख्याकार ऐसा मानते हैं कि] जिन्हें किसी प्रकरणग्रन्थ की व्याख्या करने की इच्छा हो उन्हें संक्षेप से उनका वर्णन कर ही देना चाहिये ।
तहाँ, प्रयोजनसिद्धि के अनुकूल साधन अभिव्यक्त करने के कारण अपने प्रतिपाद्य विषय से सम्बन्ध रखनेवाला शास्त्र परम्परा से विशिष्ट सम्बन्ध, विषय और प्रयोजनवाला हुआ करता है । अच्छा तो, [इस शास्त्र का] वह क्या प्रयोजन है? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार रोगी पुरुष को रोग की निवृत्ति होने पर स्वस्थता होती है उसी प्रकार दुःखाभिमानी आत्मा को द्वैतप्रपञ्च की निवृत्ति होने पर स्वस्थता मिलती है । अतः अद्वैतभाव ही इसका प्रयोजन है ।
द्वैतप्रपञ्च अविद्याजनित है इसलिये उसकी निवृत्ति विद्या से ही हो सकती है ।
अतः ब्रह्मविद्या को प्रकाशित करने के लिये ही इसका आरम्भ किया जाता है । “जहाँ द्वैत के समान होता है” “जहाँ भिन्न के समान हो वहीं कोई दूसरा दूसरे को देख सकता है अथवा दूसरा दूसरे को जानता है” “जहाँ इसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो गया है वहाँ यह किसके द्वारा किसे देखे? और किसके द्वारा किसे जाने? ” इत्यादि श्रुतियों से इसी बात की सिद्धि होती है ।
उन (चारों प्रकरणों)-में पहला प्रकरण तो ओंकार के स्वरूप का निर्णय करने के लिये है । वह आगम (श्रुति) प्रधान और आत्मतत्त्व की प्राप्ति का उपायभूत है । रज्जु में सर्पादि विकल्प की निवृत्ति होने पर जिस प्रकार रज्जु के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है उसी प्रकार जिस द्वैतप्रपञ्च की निवृत्ति होने पर अद्वैततत्त्व का बोध होता है उसी द्वैत का युक्तिपूर्वक मिथ्यात्व प्रतिपादन करने के लिये [वैतथ्य नामक] द्वितीय प्रकरण है । इसी प्रकार अद्वैत के भी मिथ्यात्व का प्रसंग उपस्थित न हो जाय इसलिये युक्तिद्वारा उसका सत्यत्व प्रतिपादन करने के लिये तृतीय (अद्वैत) प्रकरण है । तथा अद्वैत के सत्यत्व-निश्चय के विपक्षी जो अन्य अवैदिक मतान्तर हैं वे परस्परविरोधी होने के कारण मिथ्या हैं, अतः उन्हींकी युक्तियों से उनका खण्डन करने के लिये चतुर्थ (अलातशान्ति) प्रकरण है ।
ओंकार का निर्णय किस प्रकार आत्मतत्त्व की प्राप्ति का उपाय होता है, सो अब बतलाया जाता है—“ॐ यही [वह पद] है” “यही आलम्बन है” “हे सत्यकाम! यह [जो ओंकार है वही पर और अपर ब्रह्म है]” “आत्मा का ॐ इस प्रकार ध्यान करे” “ॐ यही ब्रह्म है” “यह सब ओंकार ही है” इत्यादि श्रुतियों से यही बात जानी जाती है ।
सर्पादि विकल्प की अधिष्ठानभूत रज्जु आदि के समान जिस प्रकार अद्वितीय आत्मा परमार्थ सत्य होने पर भी प्राणादि विकल्प का आश्रय है उसी प्रकार प्राणादि विकल्प को विषय करनेवाला सम्पूर्ण वाग्विलास ओंकार ही है । और वह (ओंकार) आत्मा का प्रतिपादन करनेवाला होने से उसका स्वरूप ही है । तथा ओंकार के विकाररूप शब्दों के प्रतिपाद्य आत्मा के विकल्परूप समस्त प्राणादि भी अपने प्रतिपादक शब्दों से भिन्न नहीं हैं, जैसा कि “विकार केवल वाणी का विलास और नाममात्र है” “उस ब्रह्म का यह सम्पूर्ण जगत् वाणीरूप सूत्रद्वारा नाममयी डोरी से व्याप्त है” “यह सब नाममय ही है” इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध होता है ।
इसीलिये कहते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् । अनुबन्ध- तस्योपव्याख्यानं विमर्शः वेदान्तार्थसारसंग्रहभूतमिदं प्रकरणचतुष्टयमोमित्येतदक्षरमित्याद्यारभ्यते । अत एव न पृथक्सम्बन्धाभिधेयप्रयोजनानि वक्तव्यानि । यान्येव तु वेदान्ते सम्बन्धाभिधेयप्रयोजनानि तान्येवेह भवितुमर्हन्ति । तथापि प्रकरणव्याचिख्यासुना संक्षेपतो वक्तव्यानि ।
तत्र प्रयोजनवत्साधनाभिव्यञ्जकत्वेनाभिधेयसम्बद्धं शास्त्रं पारम्पर्येण विशिष्टसम्बन्धाभिधेयप्रयोजनवद्भवति । किं पुनस्तत्प्रयोजनमित्युच्यते, रोगार्तस्येव रोगनिवृत्तौ स्वस्थता । तथा दुःखात्मकस्यात्मनो द्वैतप्रपञ्चोपशमे स्वस्थता । अद्वैतभावः प्रयोजनम् ।
द्वैतप्रपञ्चस्याविद्याकृतत्वाद्विद्यया तदुपशमः स्यादिति ब्रह्मविद्याप्रकाशनायास्यारम्भः क्रियते । “यत्र हि द्वैतमिव भवति” (बृ० उ० २ ।४ ।१४) “यत्र वान्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येदन्योऽन्यद्विजानीयात्” (बृ० उ० ४ ।३ ।३१) “यत्र वास्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्केन कं विजानीयात्” (बृ० उ० २ ।४ ।१४) इत्यादिश्रुतिभ्योऽस्यार्थस्य सिद्धिः ।
तत्र तावदोङ्कारनिर्णयाय प्रथमं प्रकरण- प्रकरणमागमप्रधानम् चतुष्टय- आत्मतत्त्वप्रतिप्रतिपाद्यार्थ- पत्त्युपायभूतम् । यस्य निरूपणम् द्वैतप्रपञ्चस्योपशमेऽद्वैतप्रतिपत्तौ रज्ज्वामिव सर्पादिविकल्पोपशमे रज्जुतत्त्वप्रतिपत्तिस्तस्य द्वैतस्य हेतुतो वैतथ्यप्रतिपादनाय द्वितीयं प्रकरणम् । तथाद्वैतस्यापि वैतथ्यप्रसङ्गप्राप्तौ युक्तितस्तथात्वदर्शनाय तृतीयं प्रकरणम् । अद्वैतस्य तथात्वप्रतिपत्तिप्रतिपक्षभूतानि यानि वादान्तराण्यवैदिकानि तेषामन्योन्यविरोधित्वादतथार्थत्वेन तदुपपत्तिभिरेव निराकरणाय चतुर्थं प्रकरणम् ।
कथं पुनरोङ्कारनिर्णय ओंकारस्य आत्मतत्त्वप्रतिआत्मप्रतिपत्ति- पत्त्युपायत्वं साधनत्वम् प्रतिपद्यत इत्युच्यते—“ओमित्येतत्” (क० उ० १ ।२ ।१५) “एतदालम्बनम्” (क० उ० १ । २ ।१७) “एतद्वै सत्यकाम” (प्र० उ० ५ ।२) “ओमित्यात्मानं युञ्जीत” (मैत्र्यु० ६ । ३) “ओमिति ब्रह्म” (तै० उ० १ । ८ । १) “ओङ्कार एवेदं सर्वम्” (छा० उ० २ ।२३ ।३) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
रज्ज्वादिरिव सर्पादिओंकारस्य विकल्पस्यास्पदोसर्वास्पदत्वम् ऽद्वय आत्मा परमार्थः सन्प्राणादिविकल्पस्यास्पदो यथा तथा सर्वोऽपि वाक्प्रपञ्चः प्राणाद्यात्मविकल्पविषय ओङ्कार एव । स चात्मस्वरूपमेव, तदभिधायकत्वात् । ओङ्कारविकारशब्दाभिधेयश्च सर्वः प्राणादिरात्मविकल्पोऽभिधान- व्यतिरेकेण नास्ति । “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६ ।१ ।४) “तदस्येदं वाचा तन्त्या नामभिर्दामभिः सर्वं सितम्” “सर्वं हीदं नामनि” इत्यादिश्रुतिभ्यः ।
अत आह—