आगम प्रकरण - कारिका 11

कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ ।
प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तौ तुर्ये न सिध्यतः ॥ ११ ॥

kāryakāraṇabaddhau tāviṣyete viśvataijasau .
prājñaḥ kāraṇabaddhastu dvau tau turye na sidhyataḥ .. 11 ..


विश्व और तैजस—ये दोनों कार्य (फलावस्था) और कारण (बीजावस्था) से बँधे हुए माने जाते हैं; किन्तु प्राज्ञ केवल कारणावस्था से ही बद्ध है । तथा तुरीय में तो ये दोनों ही नहीं हैं ॥ ११ ॥
जो किया जाय उसे कार्य कहते हैं; वह फलभाव है । और जो करता है उसे कारण कहते हैं; वह बीजभाव है । ये उपर्युक्त विश्व और तैजस तत्त्व के अग्रहण एवं अन्यथाग्रहणरूप बीजभाव और फलभाव से बँधे अर्थात् सम्यक् प्रकार से पकड़े हुए माने जाते हैं । किन्तु प्राज्ञ केवल बीजभाव से ही बँधा हुआ है । तत्त्व का अप्रतिबोधरूप बीज ही उसके प्राज्ञत्व में कारण है । इससे तात्पर्य यह है कि तुरीय में वे बीज और फलभावरूप तत्त्व का अग्रहण एवं अन्यथा ग्रहण दोनों ही नहीं रहते; उनकी तो वहाँ रहने की सम्भावना ही नहीं है ॥ ११ ॥
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कार्य क्रियत इति फलभावः । कारणं करोतीति बीजभावः । तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणाभ्यां बीजफलभावाभ्यां तौ यथोक्तौ विश्वतैजसौ बद्धौ संगृहीताविष्येते । प्राज्ञस्तु बीजभावेनैव बद्धः । तत्त्वाप्रतिबोधमात्रमेव हि बीजं प्राज्ञत्वे निमित्तम् । ततो द्वौ तौ बीजफलभावौ तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणे तुर्ये न सिध्यतो न विद्येते न सम्भवत इत्यर्थः ॥ ११ ॥

प्राज्ञ से तुरीय का भेद

किन्तु प्राज्ञ की कारणबद्धता किस प्रकार है? तथा तुरीय में तत्त्व का अग्रहण और अन्यथाग्रहणरूप बन्धन कैसे सिद्ध नहीं होते? इस पर कहते हैं, क्योंकि-
संस्कृत भाष्य पढ़ें
कथं पुनः कारणबद्धत्वं प्राज्ञस्य तुरीये वा तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणलक्षणौ बन्धौ न सिध्यत इति । यस्मात्-