आगम प्रकरण - कारिका 12

नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् ।
प्राज्ञः किञ्चन संवेत्ति तुर्यं तत्सर्वदृक्सदा ॥ १२ ॥

nātmānaṃ na parāṃścaiva na satyaṃ nāpi cānṛtam .
prājñaḥ kiñcana saṃvetti turyaṃ tatsarvadṛksadā .. 12 ..


प्राज्ञ तो न अपने को, न पराये को और न सत्य को अथवा अनृत को ही जानता है किन्तु वह तुरीय सर्वदा सर्वदृक् है ॥ १२ ॥

प्राज्ञ आत्मा से भिन्न अविद्यारूप बीज से उत्पन्न हुए बहिःस्थित वेद्यपदार्थरूप द्वैत को कुछ भी नहीं जानता, जैसा कि विश्व और तैजस उसे जानते हैं । इसीलिये यह अन्यथाग्रहण के बीजभूत तत्त्वाग्रहणरूप अन्धकार से बँधा रहता है । और क्योंकि तुरीय से भिन्न पदार्थ का सर्वथा अभाव होने के कारण वह सदा-सर्वदा सर्वदृक्स्वरूप ही है-जो सर्वरूप और उसका साक्षी भी हो उसे ‘सर्वदृक्’ कहते हैं-इसलिये उसमें तत्त्व का अग्रहणरूप बीजावस्था नहीं है और इसीलिये उसमें उससे उत्पन्न होनेवाले अन्यथाग्रहण का भी अभाव है, क्योंकि सदा प्रकाशस्वरूप सूर्य में उसके विपरीत अप्रकाशन अथवा अन्यथाप्रकाशन सम्भव नहीं है, जैसा कि “द्रष्टा की दृष्टि का विपरिलोप नहीं होता” इस श्रुति से सिद्ध होता है ।

अथवा जाग्रत् एवं स्वप्नावस्था के सम्पूर्ण भूतों में स्थित और समस्त पदार्थों के साक्षीरूप से तुरीय ही भासमान है इसलिये वह सर्वदा सर्वसाक्षी है, जैसा कि “इससे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है” इस श्रुति से प्रमाणित होता है ॥ १२ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

आत्मविलक्षणमविद्याबीजप्रसूतं बाह्यं द्वैतं प्राज्ञो न किञ्चन संवेत्ति यथा विश्वतैजसौ । ततश्चासौ तत्त्वाग्रहणेन तमसान्यथाग्रहणबीजभूतेन बद्धो भवति । यस्मात्तुरीयं तत्सर्वदृक्सदा तुरीयादन्यस्याभावात्सर्वदा सदैवेति सर्वं च तद्दृक्चेति सर्वदृक्तस्मान्न तत्त्वाग्रहणलक्षणं बीजं तत्र । तत्प्रसूतस्यान्यथाग्रहणस्याप्यत एवाभावो न हि सवितरि सदा प्रकाशात्मके तद्विरुद्धमप्रकाशनमन्यथाप्रकाशनं वा सम्भवति । “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४ । ३ । २३) इति श्रुतेः ।

अथवा जाग्रत्स्वप्नयोः सर्वभूतावस्थः सर्ववस्तुदृगाभासस्तुरीय एवेति सर्वदृक्सदा । “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ” (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्यादिश्रुतेः ॥ १२ ॥