बीजनिद्रायुतः प्राज्ञः सा च तुर्ये न विद्यते ॥ १३ ॥
dvaitasyāgrahaṇaṃ tulyamubhayoḥ prājñaturyayoḥ .
bījanidrāyutaḥ prājñaḥ sā ca turye na vidyate .. 13 ..
यह श्लोक निमित्तान्तर से प्राप्त आशङ्का की निवृत्ति के लिये है । भला द्वैताग्रहण की समानता होने पर भी प्राज्ञ की ही कारणबद्धता क्यों है? तुरीय की क्यों नहीं है? -इस प्रकार प्राप्त हुई आशङ्का को ही निवृत्त किया जाता है ।
[इसका यह कारण है] क्योंकि वह (प्राज्ञ) बीजनिद्रा से युक्त है-तत्त्व के अज्ञान का नाम निद्रा है, वही विशेष विज्ञान की उत्पत्ति का बीज है; अतः उसे ‘बीजनिद्रा’ कहते हैं-प्राज्ञ उससे युक्त है । किन्तु सर्वदा सर्वदृक्स्वरूप होने के कारण तुरीय में वह बीजनिद्रा नहीं है; अतः उसमें कारणबद्धता नहीं है-यह इसका तात्पर्य है ॥ १३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
निमित्तान्तरप्राप्ताशङ्कानिवृत्त्यर्थोऽयं श्लोकः । कथं द्वैताग्रहणस्य तुल्यत्वात्कारणबद्धत्वं प्राज्ञस्यैव न तुरीयस्येति प्राप्ताशङ्का निवर्त्यते ।
यस्माद्बीजनिद्रायुतस्तत्त्वाप्रतिबोधो निद्रा, सैव च विशेषप्रतिबोधप्रसवस्य बीजम्; सा बीजनिद्रा, तया युतः प्राज्ञः । सदा दृक्स्वभावत्वात्तत्त्वाप्रतिबोधलक्षणा निद्रा तुरीये न विद्यते । अतो न कारणबन्धस्तस्मिन्नित्यभिप्रायः ॥ १३ ॥