आगम प्रकरण - कारिका 14

स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ प्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया ।
न निद्रां नैव च स्वप्नं तुर्ये पश्यन्ति निश्चिताः ॥ १४ ॥

svapnanidrāyutāvādyau prājñastvasvapnanidrayā .
na nidrāṃ naiva ca svapnaṃ turye paśyanti niścitāḥ .. 14 ..


विश्व और तैजस-ये स्वप्न और निद्रा से युक्त हैं तथा प्राज्ञ स्वप्नरहित निद्रा से युक्त है; किन्तु निश्चित पुरुष तुरीय में न निद्रा ही देखते हैं और न स्वप्न ही ॥ १४ ॥
रज्जु में सर्प-ग्रहण के समान अन्यथाग्रहण का नाम स्वप्न है; तथा तत्त्व के अप्रतिबोधरूप तम को निद्रा कहते हैं । उन स्वप्न और निद्रा से विश्व और तैजस युक्त हैं; अतः वे कार्यकारणबद्ध कहे गये हैं । किन्तु प्राज्ञ तो स्वप्नरहित केवल निद्रा से ही युक्त है; इसलिये उसे कारणबद्ध कहा है । निश्चित यानी ब्रह्मवेत्तालोग तुरीय में ये दोनों ही बातें नहीं देखते, क्योंकि सूर्य में अन्धकार के समान वे उससे विरुद्ध हैं । अतः तुरीय कार्य अथवा कारण से बँधा हुआ नहीं है-ऐसा कहा गया है ॥ १४ ॥
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स्वप्नोऽन्यथाग्रहणं सर्प इव रज्ज्वाम् । निद्रोक्ता तत्त्वाप्रतिबोधलक्षणं तम इति । ताभ्यां स्वप्ननिद्राभ्यां युक्तौ विश्वतैजसौ । अतस्तौ कार्यकारणबद्धावित्युक्तौ । प्राज्ञस्तु स्वप्नवर्जितकेवलयैव निद्रया युत इति कारणबद्ध इत्युक्तम् । नोभयं पश्यन्ति तुरीये निश्चिता ब्रह्मविदो विरुद्धत्वात् सवितरीव तमः ।

अतो न कार्यकारणबद्ध इत्युक्तस्तुरीयः ॥ १४ ॥


अब यह बतलाया जाता है कि मनुष्य तुरीय में कब निश्चित होता है-
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कदा तुरीये निश्चितो भवतीत्युच्यते-