आगम प्रकरण - कारिका 15

अन्यथा गृह्णतः स्वप्नो निद्रा तत्त्वमजानतः ।
विपर्यासे तयोः क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते ॥ १५ ॥

anyathā gṛhṇataḥ svapno nidrā tattvamajānataḥ .
viparyāse tayoḥ kṣīṇe turīyaṃ padamaśnute .. 15 ..


अन्यथाग्रहण करने से स्वप्न होता है तथा तत्त्व को न जानने से निद्रा होती है और इन दोनों विपरीत ज्ञानों का क्षय हो जाने पर तुरीय पद की प्राप्ति होती है ॥ १५ ॥

रज्जु में सर्पग्रहण के समान स्वप्न और जागरित अवस्थाओं में तत्त्व के अन्यथाग्रहण से स्वप्न होता है तथा तत्त्व के न जानने से निद्रा होती है, जो तीनों अवस्थाओं में तुल्य है । इस प्रकार स्वप्न और निद्रा में तुल्य होने के कारण विश्व और तैजस की एक राशि है । उनमें अन्यथाग्रहण की प्रधानता होने के कारण निद्रा गौण है; अतः उन अवस्थाओं में स्वप्नरूप विपरीत ज्ञान रहता है । किन्तु तृतीय स्थान (सुषुप्ति)-में केवल तत्त्वाग्रहणरूप निद्रा ही विपर्यास है ।

अतः उन कार्यकारणरूप स्थानों के अन्यथाग्रहण और तत्त्वाग्रहणरूप विपर्यासों का परमार्थतत्त्व के बोध से क्षय हो जाने पर तुरीय पद की प्राप्ति होती है । तब उस अवस्था में दोनों प्रकार का बन्धन न देखने से पुरुष तुरीय में निश्चित हो जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स्वप्नजागरितयोरन्यथा रज्ज्वां सर्प इव गृह्णतस्तत्त्वं स्वप्नो भवति । निद्रा तत्त्वमजानतस्तिसृ-ष्ववस्थासु तुल्या । स्वप्ननिद्रयो-स्तुल्यत्वाद्विश्वतैजसयोरेकराशित्वम् । अन्यथाग्रहणप्राधान्याच्च गुणभूता निद्रेति तस्मिन्विपर्यासः स्वप्नः । तृतीये तु स्थाने तत्त्वाज्ञानलक्षणा निद्रैव केवला विपर्यासः ।

अतस्तयोः कार्यकारणस्थानयो-रन्यथाग्रहणाग्रहणलक्षणविपर्यासे कार्यकारणबन्धरूपे परमार्थ- तत्त्वप्रतिबोधतः क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते । तदोभयलक्षणं बन्धरूपं तत्रापश्यंस्तुरीये निश्चितो भवतीत्यर्थः ॥ १५ ॥