आगम प्रकरण - कारिका 16

अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते ।
अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा ॥ १६ ॥

anādimāyayā supto yadā jīvaḥ prabudhyate .
ajamanidramasvapnamadvaitaṃ budhyate tadā .. 16 ..


जिस समय अनादि माया से सोया हुआ जीव जागता है [अर्थात् तत्त्वज्ञान लाभ करता है] उसी समय उसे अज, अनिद्र और स्वप्नरहित अद्वैत आत्मतत्त्व का बोध प्राप्त होता है ॥ १६ ॥

यह जो संसारी जीव है वह तत्त्वाप्रतिबोधरूप बीजात्मिका एवं अन्यथाग्रहणरूप अनादिकाल से प्रवृत्त मायारूप निद्रा के कारण [स्वप्न और जागरित] दोनों ही अवस्थाओं में ‘यह मेरा पिता है, यह पुत्र है, यह नाती है, ये मेरे क्षेत्र, गृह और पशु हैं, मैं इनका स्वामी हूँ तथा इनके कारण सुखी-दुःखी, क्षीण और वृद्धि को प्राप्त होता हूँ’ इत्यादि प्रकार के स्वप्न देखता हुआ सो रहा है ।

जिस समय वेदान्तार्थ के तत्त्व को जाननेवाले किसी परम कारुणिक गुरु के द्वारा ‘तू इस प्रकार हेतु एवं फलस्वरूप नहीं है, किन्तु तू वही है’ इस प्रकार जगाया जाता है उस समय उसे ऐसा बोध प्राप्त होता है-

किस प्रकारका बोध होता है? [सो बतलाते हैं-] इसमें बाह्य अथवा आभ्यन्तर जन्मादि भाव विकार नहीं है, इसलिये यह अजन्मा यानी सम्पूर्ण भाव-विकारोंसे रहित है । और क्योंकि इसमें जन्मादिकी कारणभूत तथा अविद्यारूप अन्धकारकी बीजभूत अविद्या नहीं है इसलिये यह अनिद्र है । वह तुरीय अनिद्र है, इसीलिये अस्वप्न भी है; क्योंकि अन्यथाग्रहण तो [तत्त्वाप्रतिबोधरूप] निद्राहीके कारण हुआ करता है । इस प्रकार क्योंकि वह अनिद्र और अस्वप्न है इसलिये ही उस समय अजन्मा और अद्वैत तुरीय आत्माका बोध होता है ॥ १६ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

योऽयं संसारी जीवः स उभयलक्षणेन तत्त्वाप्रतिबोधरूपेण बीजात्मनान्यथाग्रहणलक्षणेन च अनादिकालप्रवृत्तेन मायालक्षणेन स्वप्नेन ममायं पिता पुत्रोऽयं नप्ता क्षेत्रं पशवोऽहमेषां स्वामी सुखी दुःखी क्षयितोऽहमनेन वर्धितश्चानेनेत्येवंप्रकारान्स्वप्नान् स्थानद्वयेऽपि पश्यन्सुप्तः ।

यदा वेदान्तार्थतत्त्वाभिज्ञेन परमकारुणिकेन गुरुणा नास्येवं त्वं हेतुफलात्मकः किं तु तत्त्वमसीति प्रतिबोध्यमानः, तदैवं प्रतिबुध्यते-

कथम्? नास्मिन्बाह्यमाभ्यन्तरं वा जन्मादिभावविकारोऽस्त्यतोऽजं सबाह्याभ्यन्तरसर्वभावविकारवर्जित-मित्यर्थः । यस्माज्जन्मादिकारणभूतं नास्मिन्नविद्यातमोबीजं निद्रा विद्यत इत्यनिद्रम् । अनिद्रं हि तत्तुरीयमत एवास्वप्नम्; तन्निमित्तत्वादन्यथाग्रहणस्य । यस्माच्चानिद्रमस्वप्नं तस्मादजमद्वैतं तुरीयमात्मानं बुध्यते तदा ॥ १६ ॥


यदि बोध प्रपञ्चनिवृत्तिसे ही होता है तो जबतक प्रपञ्चकी निवृत्ति न हो तबतक अद्वैत कैसा? इसपर कहा जाता है- यदि प्रपञ्च विद्यमान होता तो सचमुच ऐसा ही होता; किन्तु वह तो रज्जु में सर्प के समान कल्पित होने के कारण [वस्तुतः] है ही नहीं । यदि वह होता तो इसमें सन्देह नहीं, निवृत्त भी हो जाता । रज्जु में भ्रमबुद्धि से कल्पना किया हुआ सर्प [वस्तुतः] विद्यमान रहते हुए विवेक से निवृत्त नहीं होता । मायावी द्वारा फैलायी हुई माया, देखनेवालों के दृष्टिबन्धन के हटाये जाने पर, पहले विद्यमान रहती हुई निवृत्त नहीं होती । इसी प्रकार यह प्रपञ्चसंज्ञक द्वैत भी मायामात्र ही है; परमार्थतः तो रज्जु अथवा मायावी के समान अद्वैत ही है । अतः तात्पर्य यह है कि कोई भी प्रपञ्च प्रवृत्त अथवा निवृत्त होनेवाला नहीं है ॥ १७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
प्रपञ्चनिवृत्त्या चेत्प्रति-बुध्यतेऽनिवृत्ते प्रपञ्चे कथमद्वैतमित्युच्यते- सत्यमेवं स्यात्प्रपञ्चो यदि विद्येत, रज्ज्वां सर्प इव कल्पितत्वान्न तु स विद्यते । विद्यमानश्चेन्निवर्तेत न संशयः । न हि रज्ज्वां भ्रान्तिबुद्ध्या कल्पितः सर्पो विद्यमानः सन्विवेकतो निवृत्तः । नैव माया मायाविना प्रयुक्ता तद्दर्शिनां चक्षुर्बन्धापगमे विद्यमाना सती निवृत्ता । तथेदं प्रपञ्चाख्यं मायामात्रं द्वैतं रज्जुवन्मायाविवच्चाद्वैतं परमार्थतस्तस्मान्न कश्चित्प्रपञ्चः प्रवृत्तो निवृत्तो वास्तीत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥