प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥ १७ ॥
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥ १७ ॥
prapañco yadi vidyeta nivarteta na saṃśayaḥ .
māyāmātramidaṃ dvaitamadvaitaṃ paramārthataḥ .. 17 ..
प्रपञ्च यदि होता तो निवृत्त हो जाता—इसमें सन्देह नहीं । किन्तु [वास्तव में] यह द्वैत तो मायामात्र है, परमार्थतः तो अद्वैत ही है ॥ १७ ॥
गुरु-शिष्यादि विकल्प व्यावहारिक है
यदि कहो कि शासक, शास्त्र और शिष्य—इस प्रकार का विकल्प किस प्रकार निवृत्त हो सकता है? तो इसपर कहा जाता है—
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ननु शास्ता शास्त्रं शिष्य इति विकल्पः कथं निवर्तत इत्युच्यते—