विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।
उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥
उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥
vikalpo vinivarteta kalpito yadi kenacit .
upadeśādayaṃ vādo jñāte dvaitaṃ na vidyate .. 18 ..
इस [गुरु-शिष्यादि] विकल्प की यदि किसीने कल्पना की होती तो यह निवृत्त भी हो जाता । यह [गुरु-शिष्यादि] वाद तो उपदेश के ही लिये है । आत्मज्ञान हो जाने पर द्वैत नहीं रहता ॥ १८ ॥
यदि किसीने इसकी कल्पना की होती तो यह विकल्प निवृत्त हो जाता । जिस प्रकार यह प्रपञ्च माया और रज्जुसर्प के सदृश है उसी प्रकार यह शिष्यादि भेदविकल्प भी आत्मज्ञान से पूर्व ही उपदेश के निमित्त से है । अतः शिष्य, शासक और शास्त्र—यह वाद उपदेश के ही लिये है । उपदेश के कार्यस्वरूप ज्ञान के निष्पन्न होने पर, अर्थात् परमार्थतत्त्व का ज्ञान हो जाने पर द्वैत की सत्ता नहीं रहती ॥ १८ ॥
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विकल्पो विनिवर्तेत यदि केनचित्कल्पितः स्यात् । यथायं प्रपञ्चो मायारज्जुसर्पवत्तथायं शिष्यादिभेदविकल्पोऽपि प्राक् प्रतिबोधादेवोपदेशनिमित्तोऽत उपदेशादयं वादः शिष्यः शास्ता शास्त्रमिति । उपदेशकार्ये तु ज्ञाने निर्वृत्ते ज्ञाते परमार्थतत्त्वे द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥
आत्मा और उसके पादों के साथ ओङ्कार और उसकी मात्राओं का तादात्म्य
अबतक जिस ओङ्काररूप चतुष्पाद् आत्मा का अभिधेय (वाच्यार्थ)—की प्रधानता से वर्णन किया है—
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अभिधेयप्रधान ओङ्कारश्चतुष्पादात्मेति व्याख्यातो यः—