सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥
so’yamātmādhyakṣaramoṅkāro’dhimātraṃ pādā mātrā mātrāśca pādā akāra ukāro makāra iti .. 8 ..
वह यह आत्मा अक्षरदृष्टि से ओङ्कार है; वह मात्राओं को विषय करके स्थित है । पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही पाद हैं; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं ॥ ८ ॥
वह यह आत्मा अध्यक्षर है; अक्षर का आश्रय लेकर जिसका अभिधान की प्रधानता से वर्णन किया जाय उसे अध्यक्षर कहते हैं । किन्तु वह अक्षर है क्या? इसपर कहते हैं—वह ओङ्कार है । वह यह ओङ्कार पादरूप से विभक्त किये जाने पर अधिमात्र यानी मात्रा को आश्रय करके वर्तमान रहता है, इसलिये इसे ‘अधिमात्र’ कहते हैं । सो किस प्रकार? क्योंकि आत्मा के जो पाद हैं वे ही ओङ्कार की मात्राएँ हैं । वे मात्राएँ कौन-सी हैं? अकार, उकार और मकार—ये ही [वे मात्राएँ हैं] ॥ ८ ॥
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सोऽयमात्माध्यक्षरमक्षरमधिकृत्याभिधानप्राधान्येन वर्ण्यमानोऽध्यक्षरम् । किं पुनस्तदक्षरमित्याह, ओङ्कारः सोऽयमोङ्कारः पादशः प्रविभज्यमानः, अधिमात्रं मात्रामधिकृत्य वर्तत इत्यधिमात्रम् । कथम्? आत्मनो ये पादास्त ओङ्कारस्य मात्राः । कास्ताः? अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥
अकार और विश्व का तादात्म्य
अब उनमें विशेष नियम किया जाता है—
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तत्र विशेषनियमः क्रियते—