आगम प्रकरण - मन्त्र 9

जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राप्तेरादिमत्त्वाद्वाप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥

jāgaritasthāno vaiśvānaro’kāraḥ prathamā mātrāpterādimattvādvāpnoti ha vai sarvānkāmānādiśca bhavati ya evaṃ veda .. 9 ..


जिसका जागरित स्थान है वह वैश्वानर व्याप्ति और आदिमत्त्व के कारण [ओङ्कार की] पहली मात्रा अकार है । जो उपासक इस प्रकार जानता है वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है और [महापुरुषों में] आदि (प्रधान) होता है ॥ ९ ॥

जो जागरित स्थानवाला वैश्वानर है वही ओङ्कार की पहली मात्रा अकार है ।

किस समानता के कारण पहली मात्रा है—इसपर कहते हैं—आप्ति के कारण, आप्ति का अर्थ व्याप्ति है । “अकार निश्चय ही सम्पूर्ण वाणी है” इस श्रुति के अनुसार अकार से समस्त वाणी व्याप्त है । तथा “उस इस वैश्वानर आत्मा का मस्तक ही द्युलोक है” इस श्रुति के अनुसार वैश्वानर से सारा जगत् व्याप्त है ।

अभिधान (वाचक) और अभिधेय (वाच्य)—की एकता तो हम कह ही चुके हैं । जिसमें आदि (प्रथमता) हो उसे आदिमत् कहते हैं । जिस प्रकार अकार नामक अक्षर आदिमान् है उसी प्रकार वैश्वानर भी है । उसी समानता के कारण वैश्वानर की अकाररूपता है । उनकी एकता जाननेवाले के लिये फल बतलाया जाता है—‘जो पुरुष ऐसा जानता है अर्थात् उपर्युक्त एकत्व को जाननेवाला है वह समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लेता है तथा महापुरुषों में आदि—प्रथम होता है’ ॥ ९ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

जागरितस्थानो वैश्वानरो यः स ओङ्कारस्याकारः प्रथमा मात्रा ।

केन सामान्येनेत्याह—आप्तेराप्तिर्व्याप्तिरकारेण सर्वा वाग्व्याप्ता “अकारो वै सर्वा वाक्” (ऐ० आ० २ । ३ । ६) इति श्रुतेः । तथा वैश्वानरेण जगत्; “तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाः” (छा० उ० ५ । १८ । २) इत्यादिश्रुतेः ।

अभिधानाभिधेययोरेकत्वं चावोचाम । आदिरस्य विद्यत इत्यादिमद्यथैवादिमदकाराख्यमक्षरं तथैव वैश्वानरस्तस्माद्वा सामान्यादकारत्वं वैश्वानरस्य ।

तदेकत्वविदः फलमाह—आप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिः प्रथमश्च भवति महतां य एवं वेद, यथोक्तमेकत्वं वेदेत्यर्थः ॥ ९ ॥