आगम प्रकरण - मन्त्र 1

ओमित्येतदक्षरमिदग्ँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव ।
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥

omityetadakṣaramidag̐ sarvaṃ tasyopavyākhyānaṃ bhūtaṃ bhavadbhaviṣyaditi sarvamoṅkāra eva .
yaccānyattrikālātītaṃ tadapyoṅkāra eva .. 1 ..


ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है । यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसीकी व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है । इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है ॥ १ ॥

ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है । यह अभिधेय (प्रतिपाद्य)-रूप जितना पदार्थसमूह है वह अपने अभिधान (प्रतिपादक)-से अभिन्न होने के कारण और सम्पूर्ण अभिधान भी ओंकार से अभिन्न होने के कारण यह सब कुछ ओंकार ही है । परब्रह्म भी अभिधान-अभिधेय (वाच्य-वाचक)-रूप उपाय के द्वारा ही जाना जाता है, इसलिये वह भी ओंकार ही है ।

यह जो परापर ब्रह्मरूप अक्षर ॐ है, उसका उपव्याख्यान—ब्रह्म की प्राप्ति का उपाय होने के कारण उसके समीपता से स्पष्ट कथन का नाम उपव्याख्यान है वही— यहाँ प्रस्तुत जानना चाहिये । इस वाक्य में ‘प्रस्तुतं वेदितव्यम्’ (प्रस्तुत जानना चाहिये) यह वाक्यशेष है ।

भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन तीनों कालों से जो कुछ परिच्छेद्य है वह भी उपर्युक्त न्याय से ओंकार ही है । इसके सिवा जो तीनों कालों से परे, अपने कार्य से ही विदित होनेवाला और काल से अपरिच्छेद्य अव्याकृत आदि है वह भी ओंकार ही है ॥ १ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वमिति । यदिदमर्थजातमभिधेयभूतं तस्याभिधानाव्यतिरेकात्, अभिधानस्य चोङ्काराव्यतिरेकादोङ्कार एवेदं सर्वम् । परं च ब्रह्माभिधानाभिधेयोपायपूर्वकमेव गम्यत इत्योङ्कार एव ।

तस्यैतस्य परापरब्रह्मरूपस्याक्षरस्योमित्येतस्योपव्याख्यानम्; ब्रह्मप्रतिपत्त्युपायत्वाद्ब्रह्मसमीपतया विस्पष्टं प्रकथनमुपव्याख्यानं प्रस्तुतं वेदितव्यमिति वाक्यशेषः ।

भूतं भवद्भविष्यदिति कालत्रयपरिच्छेद्यं यत्तदप्योङ्कार एवोक्तन्यायतः । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं कार्याधिगम्यं कालापरिच्छेद्यमव्याकृतादि तदप्योङ्कार एव ॥ १ ॥


ओंकारवाच्य ब्रह्मकी सर्वात्मकता

वाचक और वाच्य का अभेद होने पर भी वाचक की प्रधानता से ही ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है इत्यादि रूप से निर्देश किया गया है । वाचक की प्रधानता से निर्दिष्ट वस्तु का फिर वाच्य की प्रधानता से किया हुआ निर्देश वाचक और वाच्य का एकत्व प्रतिपादन करने के लिये है; अन्यथा वाच्य की प्रतिपत्ति वाचक के अधीन होने के कारण वाच्य का वाचकरूप होना गौण ही होगा—ऐसी आशंका हो सकती है । किन्तु वाच्य (ब्रह्म) और वाचक (ओंकार)-की एकत्वप्रतिपत्ति का तो यही प्रयोजन है कि उन दोनों को एक ही प्रयत्न से एक साथ लीन करके उनसे विलक्षण ब्रह्म को प्राप्त किया जाय । ऐसा ही “पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही पाद हैं” इस श्रुति से कहेंगे भी । अब वही बात कहते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें

अभिधानाभिधेययोरेकत्वेऽप्यभिधानप्राधान्येन निर्देशः कृतः । ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वमित्यादि । अभिधानप्राधान्येन निर्दिष्टस्य पुनरभिधेयप्राधान्येन निर्देशोऽभिधानाभिधेययोरेकत्वप्रतिपत्त्यर्थः । इतरथा ह्यभिधानतन्त्राभिधेयप्रतिपत्तिरित्यभिधेयस्याभिधानत्वं गौणमित्याशङ्का स्यात् । एकत्वप्रतिपत्तेश्च प्रयोजनमभिधानाभिधेययोरेकेनैव प्रयत्नेन युगपत्प्रविलापयं- स्तद्विलक्षणं ब्रह्म प्रतिपद्येतेति । तथा च वक्ष्यति “पादा मात्रा मात्राश्च पादाः” (मा० उ०, आ० प्र० ८) इति ।

तदाह—