svapnasthānastaijasa ukāro dvitīyā mātrotkarṣādubhayatvādvotkarṣati ha vai jñānasantatiṃ samānaśca bhavati nāsyābrahmavitkule bhavati ya evaṃ veda .. 10 ..
जो स्वप्नस्थानवाला तैजस है वह ओङ्कार की दूसरी मात्रा उकार है । किस समानता के कारण दूसरी मात्रा है—इसपर कहते हैं—उत्कर्ष के कारण । जिस प्रकार अकार से उकार उत्कृष्ट-सा है उसी प्रकार विश्व से तैजस उत्कृष्ट है । अथवा मध्यवर्त्तित्व के कारण [उन दोनों में समानता है] । जिस प्रकार उकार अकार और मकार के मध्य में स्थित है उसी प्रकार विश्व और प्राज्ञ के मध्य में तैजस है । अतः उभयपरत्वरूप समानता के कारण भी [उनमें अभिन्नता है] ।
अब इस प्रकार जाननेवाले को जो फल मिलता है वह बतलाया जाता है—जो इस प्रकार जानता है वह ज्ञानसन्तति अर्थात् विज्ञानसन्तान का उत्कर्ष यानी वृद्धि करता है, सबके प्रति समान—तुल्य होता है अर्थात् मित्रपक्ष के समान शत्रुपक्ष का भी अद्वेष्य होता है तथा उसके कुल में कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता ॥ १० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स्वप्नस्थानस्तैजसो यः स ओङ्कारस्योकारो द्वितीया मात्रा । केन सामान्येनेत्याह—उत्कर्षात् । अकारादुत्कृष्ट इव ह्युकारस्तथा तैजसो विश्वादुभयत्वाद्वाकारमकारयोर्मध्यस्थ उकारस्तथा विश्वप्राज्ञयोर्मध्ये तैजसोऽत उभयभाक्त्वसामान्यात् ।
विद्वत्फलमुच्यते—उत्कर्षति ह वैज्ञानसन्ततिम् । विज्ञानसन्ततिं वर्धयतीत्यर्थः । समानस्तुल्यश्च मित्रपक्षस्येव शत्रुपक्षाणामप्यप्रद्वेष्यो भवति । अब्रह्मविदस्य कुले न भवति य एवं वेद ॥ १० ॥