suṣuptasthānaḥ prājño makārastṛtīyā mātrā miterapītervā minoti ha vā idaṃ sarvamapītiśca bhavati ya evaṃ veda .. 11 ..
सुषुप्तिस्थानवाला जो प्राज्ञ है वह ओङ्कार की तीसरी मात्रा मकार है । किस समानता के कारण? सो बतलाते हैं—यहाँ इनमें यह समानता है—ये मिति के कारण [समान हैं] । मिति मान को कहते हैं; जिस प्रकार प्रस्थ (एक प्रकार के बाट)-से जौ तौले जाते हैं उसी प्रकार प्रलय और उत्पत्ति के समय मानो प्रवेश और निर्गमन के द्वारा प्राज्ञ से विश्व और तैजस मापे जाते हैं; क्योंकि ओङ्कार की समाप्तिपर उसका पुनः प्रयोग किये जानेपर मानो अकार और उकार, मकार में प्रवेश करके उससे पुनः निकलते हैं ।
अथवा अपीति के कारण भी उनमें एकता है । अपीति अप्यय अर्थात् एकीभाव को कहते हैं । क्योंकि [जिस प्रकार] ओङ्कार का उच्चारण करनेपर अकार और उकार अन्तिम अक्षर में एकीभूत-से हो जाते हैं उसी प्रकार सुषुप्ति के समय विश्व और तैजस प्राज्ञ में लीन हो जाते हैं । सो, इस समानता के कारण भी प्राज्ञ और मकार की एकता है ।
अब इस प्रकार जाननेवाले को जो फल मिलता है वह बतलाते हैं—[जो ऐसा जानता है] वह इस सम्पूर्ण जगत् को माप लेता है, अर्थात् इसका यथार्थ स्वरूप जान लेता है; तथा अपीति यानी जगत् का कारणस्वरूप हो जाता है । यहाँ जो अवान्तर फल बतलाये गये हैं वे प्रधान साधन की स्तुति के लिये हैं ॥ ११ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो यः स ओङ्कारस्य मकारस्तृतीया मात्रा । केन सामान्येनेत्याह सामान्यमिदमत्र; मितेर्मितिर्मानं मीयते इव हि विश्वतैजसौ प्राज्ञेन प्रलयोत्पत्त्योः प्रवेशनिर्गमाभ्यां प्रस्थेनेव यवाः । यथोङ्कारसमाप्तौ पुनः प्रयोगे च प्रविश्य निर्गच्छत इवाकारोकारौ मकारे ।
अपीतेर्वा । अपीतिरप्यय एकीभावः । ओङ्कारोच्चारणे ह्यन्त्येऽक्षर एकीभूताविवाकारोकारौ ।
तथा विश्वतैजसौ सुषुप्तकाले प्राज्ञे । अतो वा सामान्यादेकत्वं प्राज्ञमकारयोः ।
विद्वत्फलमाह; मिनोति ह वा इदं सर्वं जगद्याथात्म्यं जानातीत्यर्थः । अपीतिश्च जगत्कारणात्मा भवतीत्यर्थः । अत्रावान्तरफलवचनं प्रधानसाधनस्तुत्यर्थम् ॥ ११ ॥
मात्राओंकी विश्वादिरूपता
अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थ में ये श्लोक भी हैं—