विश्वस्यात्वविवक्षायामादिसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥ १९ ॥
मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥ १९ ॥
viśvasyātvavivakṣāyāmādisāmānyamutkaṭam .
mātrāsampratipattau syādāptisāmānyameva ca .. 19 ..
जिस समय विश्व का अत्व—अकारमात्रत्व बतलाना इष्ट हो, अर्थात् वह अकारमात्रारूप है ऐसा जाना जाय तो उनके प्राथमिकत्व की समानता स्पष्ट ही है तथा उनकी व्याप्तिरूप समानता भी स्फुट ही है ॥ १९ ॥
जिस समय विश्व का अत्व यानी अकारमात्रत्व कहना इष्ट होता है उस समय पूर्वोक्त न्याय से उनके प्राथमिकत्व की समानता उत्कट अर्थात् उद्भूत (प्रकटरूप से) दिखायी देती है ।
‘मात्रासम्प्रतिपत्तौ’— यह ‘अत्वविवक्षायाम्’ इस पद की ही व्याख्या है । तात्पर्य यह है कि जिस समय विश्व के अकारमात्रत्व का ज्ञान होता है उस समय उनकी व्याप्ति की समानता तो स्पष्ट ही है । यहाँ ‘च’ शब्द से ‘उत्कटम्’ इस पद की अनुवृत्ति की जाती है ॥ १९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
विश्वस्यात्वमकारमात्रत्वं यदा विवक्ष्यते तदादित्वसामान्यमुक्तन्यायेनोत्कटमुद्भूतं दृश्यत इत्यर्थः । अत्वविवक्षायामित्यस्य व्याख्यानं मात्रासम्प्रतिपत्ताविति विश्वस्याकारमात्रत्वं यदा सम्प्रतिपद्यत इत्यर्थः । आप्तिसामान्यमेव चोत्कटमित्यनुवर्तते च शब्दात् ॥ १९ ॥