आगम प्रकरण - कारिका 21

मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासम्प्रतिपत्तौ तु लयसामान्यमेव च ॥ २१ ॥

makārabhāve prājñasya mānasāmānyamutkaṭam .
mātrāsampratipattau tu layasāmānyameva ca .. 21 ..


प्राज्ञ की मकाररूपता में अर्थात् प्राज्ञ मकारमात्रारूप है—ऐसा जानने में उनकी मान करने की समानता स्पष्ट है । इसी प्रकार उनमें लयस्थान होने की समानता भी स्पष्ट ही है ॥ २१ ॥
प्राज्ञ के मकाररूप होने में मान और लयरूप समानता स्पष्ट हैं— यह इसका तात्पर्य है ॥ २१ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
मकारत्वे प्राज्ञस्य मितिलयावुत्कृष्टे सामान्ये इत्यर्थः ॥ २१ ॥