त्रिषु धामसु यस्तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितः ।
स पूज्यः सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ॥ २२ ॥
स पूज्यः सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ॥ २२ ॥
triṣu dhāmasu yastulyaṃ sāmānyaṃ vetti niścitaḥ .
sa pūjyaḥ sarvabhūtānāṃ vandyaścaiva mahāmuniḥ .. 22 ..
जो पुरुष तीनों स्थानों में [बतलायी गयी] तुल्यता अथवा समानता को निश्चयपूर्वक जानता है वह महामुनि समस्त प्राणियों का पूजनीय और वन्दनीय होता है ॥ २२ ॥
उपर्युक्त तीनों स्थानों में तुल्यरूप से बतलायी गयी समानता को जो ‘यह इसी प्रकार है’ ऐसा निश्चयपूर्वक जानता है वह ब्रह्मवेत्ता लोक में पूजनीय एवं वन्दनीय होता है ॥ २२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथोक्तस्थानत्रये यस्तुल्यमुक्तं सामान्यं वेत्त्येवमेवैतदिति निश्चितो यः स पूज्यो वन्द्यश्च ब्रह्मविल्लोके भवति ॥ २२ ॥
ओङ्कारकी व्यस्तोपासनाके फल
पूर्वोक्त समानताओं से आत्मा के पादों का मात्राओं के साथ एकत्व करके उपर्युक्त ओङ्कार को जानते हुए जो उसका ध्यान करता है उसे—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथोक्तैः सामान्यैरात्मपादानां मात्राभिः सहैकत्वं कृत्वा यथोक्तोङ्कारं प्रतिपद्य यो ध्यायति तम्—