आगम प्रकरण - कारिका 23

अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम् ।
मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यते गतिः ॥ २३ ॥

akāro nayate viśvamukāraścāpi taijasam .
makāraśca punaḥ prājñaṃ nāmātre vidyate gatiḥ .. 23 ..


अकार विश्व को प्राप्त करा देता है तथा उकार तैजस को और मकार प्राज्ञ को; किन्तु अमात्र में किसी की गति नहीं है ॥ २३ ॥
अकार विश्व को प्राप्त करा देता है; अर्थात् अकार के आश्रित ओङ्कार को जाननेवाला पुरुष वैश्वानर होता है । इसी प्रकार उकार तैजस को और मकार पुनः प्राज्ञ को प्राप्त करा देता है । ‘च’ शब्द से ‘नयते’ (प्राप्त करा देता है) इस क्रिया की अनुवृत्ति होती है । तथा मकार का क्षय होनेपर बीजभाव का क्षय हो जाने से मात्राहीन ओङ्कार में कोई गति नहीं होती—यह इसका तात्पर्य है ॥ २३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अकारो नयते विश्वं प्रापयति । अकारालम्बनोङ्कारं विद्वान्वैश्वानरो भवतीत्यर्थः । तथोकारस्तैजसम् । मकारश्चापि पुनः प्राज्ञम् । च शब्दान्नयत इत्यनुवर्तते । क्षीणे तु मकारे बीजभावक्षयादमात्र ओङ्कारे गतिर्न विद्यते क्वचिदित्यर्थः ॥ २३ ॥