amātraścaturtho’vyavahāryaḥ prapañcopaśamaḥ śivo’dvaita evamoṅkāra ātmaiva saṃviśatyātmanātmānaṃ ya evaṃ veda .. 12 ..
अमात्र—जिसकी मात्रा नहीं है वह अमात्र ओङ्कार चौथा अर्थात् तुरीय केवल आत्मा ही है । अभिधानरूप वाणी और अभिधेयरूप मन का क्षय हो जाने के कारण वह अव्यवहार्य है । तथा वह प्रपञ्च की निषेधावधि, मङ्गलमय और अद्वैतस्वरूप है । इस प्रकार पूर्वोक्त विज्ञानवान् उपासक द्वारा प्रयोग किया हुआ तीन मात्रावाला ओङ्कार तीन पादवाला आत्मा ही है । जो इस प्रकार जानता है [अर्थात् इस प्रकार उसकी उपासना करता है] वह स्वतः ही अपने पारमार्थिक आत्मा में प्रवेश करता है । परमार्थदर्शी ब्रह्मवेत्ता तीसरे बीजभाव को भी दग्ध करके आत्मा में प्रवेश करता है; इसलिये उसका पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि तुरीय आत्मा अबीजात्मक है ।
रज्जु और सर्प का विवेक हो जानेपर रज्जु में लीन हुआ सर्प जिन्हें उसका विवेक हो गया है उन पुरुषों को बुद्धि के संस्कारवश पुनः प्रतीत नहीं हो सकता । किन्तु जो मन्द और मध्यम बुद्धिवाले, साधकभाव को प्राप्त, सन्मार्गगामी संन्यासी पूर्वोक्त मात्रा और पादों के निश्चित सामान्यभाव को जाननेवाले हैं उनके लिये तो विधिवत् उपासना किया हुआ ओङ्कार ब्रह्मप्राप्ति के लिये आश्रयस्वरूप होता है । यही बात ‘‘तीन प्रकार के आश्रम हैं’’ इत्यादि वाक्यों से कहेंगे ॥ १२ ॥
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अमात्रो मात्रा यस्य नास्ति सोऽमात्र ओङ्कारश्चतुर्थस्तुरीय आत्मैव केवलोऽभिधानाभिधेयरूपयोर्वाङ्मनसयोः क्षीणत्वादव्यवहार्यः । प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैतः संवृत्त एवं यथोक्तविज्ञानवता प्रयुक्त ओङ्कारस्त्रिमात्रस्त्रिपाद आत्मैव ।
संविशत्यात्मना स्वेनैव स्वं पारमार्थिकमात्मानं य एवं वेद । परमार्थदर्शी ब्रह्मवित् तृतीयं बीजभावं दग्ध्वात्मानं प्रविष्ट इति न पुनर्जायते तुरीयस्याबीजत्वात् ।
न हि रज्जुसर्पयोर्विवेके रज्ज्वां प्रविष्टः सर्पो बुद्धिसंस्कारात्पुनः पूर्ववत्तद्विवेकिनामुत्थास्यति । मन्दमध्यमधियां तु प्रतिपन्नसाधकभावानां सन्मार्गगामिनां संन्यासिनां मात्राणां पादानां च क्लृप्तसामान्यविदां यथावदुपास्यमान ओङ्कारो ब्रह्मप्रतिपत्तय आलम्बनी भवति तथा च वक्ष्यति— ‘‘आश्रमास्त्रिविधाः’’(माण्डू० का० ३ । १६) इत्यादि ॥ १२ ॥
समस्त और व्यस्त ओङ्कारोपासना
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अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थ में ये श्लोक भी हैं—