आगम प्रकरण - कारिका 25

युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् ।
प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २५ ॥

yuñjīta praṇave cetaḥ praṇavo brahma nirbhayam .
praṇave nityayuktasya na bhayaṃ vidyate kvacit .. 25 ..


चित्त को ओङ्कार में समाहित करे; ओङ्कार निर्भय ब्रह्मपद है । ओङ्कार में नित्य समाहित रहनेवाले पुरुष को कहीं भी भय नहीं होता ॥ २५ ॥
जिसकी पहले व्याख्या की जा चुकी है उस परमार्थस्वरूप ओङ्कार में चित्त को युक्त—समाहित करे, क्योंकि ओङ्कार ही निर्भय ब्रह्म है । उसमें नित्य समाहित रहनेवाले पुरुष को कहीं भी भय नहीं होता, जैसा कि ‘‘विद्वान् कहीं भी भय को प्राप्त नहीं होता’’ इस श्रुति से प्रमाणित होता है ॥ २५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
युञ्जीत समादध्याद्यथा व्याख्याते परमार्थरूपे प्रणवे चेतो मनः । यस्मात्प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् । न हि तत्र सदा युक्तस्य भयं विद्यते क्वचित् ‘‘विद्वान्न बिभेति कुतश्चन’’ (तै० उ० २ । ९) इति श्रुतेः ॥ २५ ॥