sarvag̐hyetad brahmāyamātmā brahma so’yamātmā catuṣpāt .. 2 ..
यह सब ब्रह्म ही है । अर्थात् यह सब, जो ओंकारमात्र कहा गया है, ब्रह्म है । अबतक परोक्षरूप से बतलाये हुए उस ब्रह्म को विशेषरूप से प्रत्यक्षतया ‘यह आत्मा ब्रह्म है’ ऐसा कहकर निर्देश करते हैं । यहाँ ‘अयम्’ शब्दद्वारा चतुष्पादरूप से विभक्त किये जानेवाले आत्मा को अपने अन्तरात्मस्वरूप से अभिनय (अंगुलि-निर्देश)-पूर्वक ‘अयमात्मा ब्रह्म’ ऐसा कहकर बतलाते हैं । ओंकार नाम से कहा जानेवाला तथा पर और अपररूप से व्यवस्थित वह यह आत्मा कार्षापण के समान चार पाद (अंश)-वाला है, गौ के समान नहीं । विश्व आदि तीन पादों में से क्रमशः पूर्व-पूर्व का लय करते हुए अन्त में तुरीय ब्रह्म की उपलब्धि होती है । अतः पहले तीन पादों में ‘पाद’ शब्द करणवाच्य है और तुरीय में ‘जो प्राप्त किया जाय’ इस प्रकार कर्मवाच्य है ॥ २ ॥
वह किस प्रकार चार पादोंवाला है, सो बतलाते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
सर्वं ह्येतद्ब्रह्मेति । सर्वं यदुक्तमोङ्कारमात्रमिति तदेतद्ब्रह्म । तच्च ब्रह्म परोक्षाभिहितं प्रत्यक्षतो विशेषेण निर्दिशति— अयमात्मा ब्रह्मेति । अयमिति चतुष्पात्त्वेन प्रविभज्यमानं प्रत्यगात्मतयाभिनयेन निर्दिशति— अयमात्मेति । सोऽयमात्मोङ्काराभिधेयः परापरत्वेनव्यवस्थितश्चतुष्पात्कार्षापणवन्न गौरिवेति । त्रयाणां विश्वादीनां पूर्वपूर्वप्रविलापनेन तुरीयस्य प्रतिपत्तिरिति करणसाधनः पादशब्दः । तुरीयस्य पद्यत इति कर्मसाधनः पादशब्दः ॥ २ ॥
कथं चतुष्पात्त्वमित्याह—