आगम प्रकरण - कारिका 26

प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः ।
अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥ २६ ॥

praṇavo hyaparaṃ brahma praṇavaśca paraḥ smṛtaḥ .
apūrvo’nantaro’bāhyo’naparaḥ praṇavo’vyayaḥ .. 26 ..


ओङ्कार ही परब्रह्म है और ओङ्कार ही अपरब्रह्म माना गया है । वह ओङ्कार अपूर्व (अकारण), अन्तर्बाह्यशून्य, अकार्य तथा अव्यय है ॥ २६ ॥
पर और अपर ब्रह्म प्रणव हैं । वस्तुतः मात्रारूप पादों के क्षीण होनेपर पर आत्मा ही ब्रह्म है, इसलिये इसका कोई पूर्व यानी कारण न होने से यह अपूर्व है । इसका कोई अन्तर—भिन्नजातीय भी नहीं है, इसलिये यह अनन्तर है तथा इससे बाह्य भी कोई और नहीं है, इसलिये यह अबाह्य है और इसका कोई अपर—कार्य भी नहीं है इसलिये यह अनपर है । तात्पर्य यह है कि यह बाहर-भीतर से अजन्मा तथा सैन्धवघन के समान प्रज्ञानघन ही है ॥ २६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
परापरे ब्रह्मणी प्रणवः । परमार्थतः क्षीणेषु मात्रापादेषु पर एवात्मा ब्रह्मेति न पूर्वं कारणमस्य विद्यत इत्यपूर्वः । नास्यान्तरं भिन्नजातीयं किञ्चिद्विद्यत इत्यनन्तरः । तथा बाह्यमन्यन्न विद्यत इत्यबाह्यः । अपरं कार्यमस्य न विद्यत इत्यनपरः । स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघन इत्यर्थः ॥ २६ ॥