आगम प्रकरण - कारिका 27

सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च ।
एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥ २७ ॥

sarvasya praṇavo hyādirmadhyamantastathaiva ca .
evaṃ hi praṇavaṃ jñātvā vyaśnute tadanantaram .. 27 ..


प्रणव ही सबका आदि, मध्य और अन्त है । प्रणव को इस प्रकार जानने के अनन्तर तद्रूपता को प्राप्त हो जाता है ॥ २७ ॥
सबका आदि, मध्य और अन्त अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय प्रणव ही है । जिस प्रकार कि मायामय हाथी, रज्जु में प्रतीत होनेवाले सर्प, मृगतृष्णा और स्वप्नादि के समान उत्पन्न होनेवाले आकाशादिरूप प्रपञ्च के कारण मायावी आदि हैं उसी प्रकार मायावी आदिस्थानीय उस प्रणवरूप आत्मा को जानकर विद्वान् तत्काल ही तद्रूपता को प्राप्त हो जाता है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ २७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
आदिमध्यान्ता उत्पत्तिस्थितिप्रलयाः सर्वस्यैव । मायाहस्तिरज्जुसर्पमृगतृष्णिका स्वप्नादिवद् उत्पद्यमानस्य वियदादिप्रपञ्चस्य यथा मायाव्यादयः । एवं हि प्रणवमात्मानं मायाव्यादिस्थानीयं ज्ञात्वा तत्क्षणादेव तदात्मभावं व्यश्नुत इत्यर्थः ॥ २७ ॥