आगम प्रकरण - कारिका 28

प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् ।
सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २८ ॥

praṇavaṃ hīśvaraṃ vidyātsarvasya hṛdi saṃsthitam .
sarvavyāpinamoṅkāraṃ matvā dhīro na śocati .. 28 ..


प्रणव को ही सबके हृदय में स्थित ईश्वर जाने । इस प्रकार सर्वव्यापी ओङ्कार को जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २८ ॥
प्रणव को ही समस्त प्राणिसमुदाय के स्मृतिप्रत्यय के आश्रयभूत हृदय में स्थित ईश्वर समझे । बुद्धिमान् पुरुष आकाश के समान सर्वव्यापी ओङ्कार को असंसारी आत्मा [—शुद्ध आत्मतत्त्व] जानकर, शोक के कारण का अभाव हो जाने से शोक नहीं करता; जैसा कि ‘‘आत्मवेत्ता शोक को पार कर जाता है’’ इत्यादि श्रुतियों से प्रमाणित होता है ॥ २८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
सर्वप्राणिजातस्य स्मृतिप्रत्ययास्पदे हृदये स्थितमीश्वरं प्रणवं विद्यात्सर्वव्यापिनं व्योमवदोङ्कारमात्मानमसंसारिणं धीरो बुद्धिमान्मत्वा न शोचति शोकनिमित्तानुपपत्तेः । ‘‘तरति शोकमात्मवित्’’ (छा० उ० ७ । १ । ३) इत्यादि श्रुतिभ्यः ॥ २८ ॥