इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य शङ्करभगवतः कृतावागमशास्त्रविवरणे गौडपादीयकारिकासहितमाण्डूक्योपनिषद्भाष्ये प्रथममागमप्रकरणम् ॥ १ ॥
अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।
ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः ॥ २९ ॥
ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नेतरो जनः ॥ २९ ॥
amātro’nantamātraśca dvaitasyopaśamaḥ śivaḥ .
oṅkāro vidito yena sa munirnetaro janaḥ .. 29 ..
जिसने मात्राहीन, अनन्त मात्रावाले, द्वैत के उपशमस्थान और मङ्गलमय ओङ्कार को जाना है वही मुनि है; और कोई पुरुष नहीं ॥ २९ ॥
अमात्र तुरीय ओङ्कार है । जिससे मान किया जाय उसे ‘मात्रा’ अर्थात् ‘परिच्छित्ति’ कहते हैं; वह मात्रा जिसकी अनन्त हो उसे ‘अनन्तमात्र’ कहा जाता है । तात्पर्य यह है कि इसकी इयत्ता का परिच्छेद नहीं किया जा सकता । सम्पूर्ण द्वैत का उपशमस्थान होने के कारण ही वह शिव (मङ्गलमय) है । इस प्रकार व्याख्या किया हुआ ओङ्कार जिसने जाना है वही परमार्थतत्त्व का मनन करनेवाला होने से ‘मुनि’ है; दूसरा पुरुष शास्त्रज्ञ होने पर भी मुनि नहीं है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ २९ ॥
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अमात्रस्तुरीय ओङ्कारः । मीयतेऽनयेति मात्रा परिच्छित्तिः सा अनन्ता यस्य सोऽनन्तमात्रः । नैतावत्त्वमस्य परिच्छेत्तुं शक्यत इत्यर्थः । सर्वद्वैतोपशमत्वादेव शिवः । ओङ्कारो यथा व्याख्यातो विदितो येन स परमार्थतत्त्वस्य मननान्मुनिः । नेतरो जनः शास्त्रविदपीत्यर्थः ॥ २९ ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
वैतथ्यप्रकरण
“एकमेवाद्वितीयम्” इत्यादि श्रुतियों के अनुसार (आगमप्रकरण की १८वीं कारिका में) यह कहा गया है कि ज्ञान हो जाने पर द्वैत नहीं रहता । वह केवल आगम (शास्त्रवचन)-मात्र था । किन्तु द्वैत का मिथ्यात्व युक्ति से भी निश्चय किया जा सकता है, इसीलिये इस दूसरे प्रकरण का आरम्भ किया जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इत्युक्तम्, प्रकरणस्य “एकमेवाद्वितीयम्” प्रयोजनम् (छा० उ० ६ ।२ ।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः । आगममात्रं तत् । तत्रोपपत्त्यापि द्वैतस्य वैतथ्यं शक्यतेऽवधारयितुमिति द्वितीयं प्रकरणमारभ्यते—