आगम प्रकरण - मन्त्र 3

जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ ३ ॥

jāgaritasthāno bahiṣprajñaḥ saptāṅga ekonaviṃśatimukhaḥ sthūlabhugvaiśvānaraḥ prathamaḥ pādaḥ .. 3 ..


जाग्रत्-अवस्था जिस [की अभिव्यक्ति]-का स्थान है, जो बहिःप्रज्ञ (बाह्य विषयों को प्रकाशित करनेवाला) सात अङ्गोंवाला, उन्नीस मुखोंवाला और स्थूल विषयों का भोक्ता है, वह वैश्वानर पहला पाद है ॥ ३ ॥

जाग्रत्-अवस्था जिसका स्थान है, उसे जागरितस्थान कहते हैं । जिसकी अपने से भिन्न विषयों में प्रज्ञा है, उसे बहिष्प्रज्ञ कहते हैं, अर्थात् जिसकी अविद्याकृत बुद्धि बाह्य विषयों से सम्बद्ध-सी भासती है । इसी प्रकार जिसके सात अङ्ग हैं अर्थात् “इस उस वैश्वानर आत्मा का द्युलोक सिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, आकाश मध्यस्थान (देह) है, अन्न (अन्न का कारणरूप जल) ही मूत्र स्थान है और पृथिवी ही चरण है” इस श्रुति के अनुसार अग्निहोत्रकल्पना में अङ्गभूत होने के कारण आहवनीय अग्नि उसके मुखरूप से बतलाया गया है । इस प्रकार जिसके सात अङ्ग हैं, उसे ही सप्ताङ्ग कहते हैं ।

तथा जिसके उन्नीस मुख हैं, दस तो ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राणादि वायु तथा मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त—ये जिसके मुख के समान मुख अर्थात् उपलब्धि के द्वार हैं, वह ऐसे विशेषणोंवाला वैश्वानर उपर्युक्त द्वारों से शब्द आदि स्थूल विषयों को भोगता है इसलिये वह स्थूलभुक् है । सम्पूर्ण नरों को [अनेक प्रकार की योनियों में] नयन (वहन) करने के कारण वह ‘वैश्वानर’ कहलाता है; अथवा वह विश्व (समस्त) नररूप है इसलिये विश्वानर है । विश्वानर ही [स्वार्थ में तद्धित अण् प्रत्यय होने से] वैश्वानर कहलाता है । समस्त देहों से अभिन्न होने के कारण वही पहला पाद है । परवर्ती पादों का ज्ञान पहले इसका ज्ञान होने पर ही होता है, इसलिये यह प्रथम है ।

शङ्का—“अयमात्मा ब्रह्म” इस श्रुति के अनुसार यहाँ प्रत्यगात्मा को चार पादोंवाला बतलाने का प्रसङ्ग था । उसमें द्युलोकादि को उसके मूर्धा आदि अङ्गरूप से कैसे बतलाने लगे?

समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इस आत्मा के द्वारा ही अधिदैवसहित सम्पूर्ण प्रपञ्च के चतुष्पात्त्व का प्रतिपादन करना इष्ट है । ऐसा होने पर ही सारे प्रपञ्च के निषेधपूर्वक अद्वैत की सिद्धि हो सकेगी । समस्त भूतों में स्थित एक आत्मा और आत्मा में सम्पूर्ण भूतों का साक्षात्कार हो सकेगा और इसी प्रकार “जो सारे भूतों को [आत्मा में ही देखता है]” इत्यादि श्रुतियों के अर्थ का उपसंहार हो सकेगा । नहीं तो सांख्यदर्शन आदि के समान अपने देह में परिच्छिन्न अन्तरात्मा का ही दर्शन होगा । ऐसा होने पर ‘अद्वैत है’ इस श्रुतिप्रतिपादित विशेष भाव की सिद्धि नहीं होगी; क्योंकि सांख्यादि दर्शनों की अपेक्षा इसमें कुछ विशेषता नहीं रहेगी । परन्तु सम्पूर्ण उपनिषदों को आत्मा के एकत्व का प्रतिपादन तो इष्ट ही है । इसलिये इस आध्यात्मिक पिण्डात्मा का द्युलोक आदि के अङ्गरूप से आधिदैविक पिण्डात्मा के साथ एकत्व प्रतिपादन करने के अभिप्राय से उसका सप्ताङ्गत्व प्रतिपादन उचित ही है । इसके सिवा [आत्मा की व्यस्तोपासना के निन्दक] “तेरा सिर गिर जाता” आदि वाक्य भी इसमें हेतु हैं ।

यहाँ जो विराट् के साथ एकत्व प्रतिपादन किया है, वह हिरण्यगर्भ और अव्याकृत के एकत्व को उपलक्षित कराने के लिये है । मधुब्राह्मण में ऐसा कहा भी है—“यह जो इस पृथिवी में तेजोमय एवं अमृतमय पुरुष है तथा यह जो अध्यात्मपुरुष है [वे दोनों एक हैं]” इत्यादि । कोई विशेषता न रहने के कारण सोये हुए पुरुष और अव्याकृत का एकत्व तो सिद्ध ही है । ऐसा होने पर ही यह सिद्ध होगा कि सम्पूर्ण द्वैत की निवृत्ति होने पर अद्वैत ही है ॥ ३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

जागरितं स्थानमस्येति जागरितस्थानः । बहिष्प्रज्ञः स्वात्मव्यतिरिक्ते विषये प्रज्ञा यस्य स बहिष्प्रज्ञो बहिर्विषयेव प्रज्ञाविद्याकृतावभासत इत्यर्थः । तथा सप्ताङ्गान्यस्य “तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मात्मा संदेहो बहुलो वस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादौ” (छा० उ० ५ ।१८ ।२) इत्यग्निहोत्रकल्पनाशेषत्वेनाहवनीयो- ऽग्निरस्य मुखत्वेनोक्त इत्येवं सप्ताङ्गानि यस्य स सप्ताङ्गः ।

तथैकोनविंशतिर्मुखान्यस्य बुद्धीन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि च दश वायवश्च प्राणादयः पञ्च मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमिति मुखानीव मुखानि तान्युपलब्धिद्वाराणीत्यर्थः, स एवंविशिष्टो वैश्वानरो यथोक्तैर्द्वारैः शब्दादीन्स्थूलान्विषयान्भुङ्क्त इति स्थूलभुक् । विश्वेषां नराणामनेकधा नयनाद्वैश्वानरः । यद्वा विश्वश्चासौ नरश्चेति विश्वानरः । विश्वानर एव वैश्वानरः । सर्वपिण्डात्मनानन्यत्वात् स प्रथमः पादः । एतत्पूर्वकत्वादुत्तरपादाधिगमस्य प्राथम्यमस्य ।

कथमयमात्मा ब्रह्मेति प्रत्यगात्मनोऽस्य चतुष्पात्त्वे प्रकृते द्युलोकादीनां मूर्धाद्यङ्गत्वमिति ।

नैष दोषः । सर्वस्य प्रपञ्चस्य वैश्वानरस्य सप्ताङ्ग- साधिदैविकत्वादि प्रतिपादने स्यानेनात्मना हेतुः चतुष्पात्त्वस्य विवक्षितत्वात् । एवं च सति सर्वप्रपञ्चोपशमेऽद्वैतसिद्धिः । सर्वभूतस्थश्चात्मैको दृष्टः स्यात् सर्वभूतानि चात्मनि । “यस्तु सर्वाणि भूतानि” (ई० उ० ६) इत्यादिश्रुत्यर्थ उपसंहृतश्चैवं स्यात् । अन्यथा हि स्वदेहपरिच्छिन्न एव प्रत्यगात्मा सांख्यादिभिरिव दृष्टः स्यात्तथा च सत्यद्वैतमिति श्रुतिकृतो विशेषो न स्यात्, सांख्यादिदर्शनेनाविशेषात् । इष्यते च सर्वोपनिषदां सर्वात्मैक्यप्रतिपादकत्वम् । अतो युक्तमेवास्याध्यात्मिकस्य पिण्डात्मनो द्युलोकाद्यङ्गत्वेन विराडात्मनाधिदैविकेनैकत्वमभिप्रेत्य सप्ताङ्गत्ववचनम् । “मूर्धा ते व्यपतिष्यत्” (छा० उ० ५ ।१२ ।२) इत्यादिलिङ्गदर्शनाच्च ।

विराजैकत्वमुपलक्षणार्थं हिरण्यगर्भाव्याकृतात्मनोः । उक्तं चैतन् मधुब्राह्मणे “यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मम्” (बृ० उ० २ ।५ ।१) इत्यादि । सुषुप्ताव्याकृतयोस्त्वेकत्वं सिद्धमेव निर्विशेषत्वात् । एवं च सत्येतत्सिद्धं भविष्यति सर्वद्वैतोपशमे चाद्वैतमिति ॥ ३ ॥