svapnasthāno’ntaḥprajñaḥ saptāṅga ekonaviṃśatimukhaḥ praviviktabhuktaijaso dvitīyaḥ pādaḥ .. 4 ..
स्वप्न इस तैजस का स्थान है, इसलिये यह स्वप्नस्थानवाला [कहा जाता] है । अनेक साधनवती जाग्रत्कालीना बुद्धि मन का स्फुरणमात्र होने पर भी बाह्यविषयसम्बन्धिनी-सी प्रतीत होती हुई मन में वैसा ही संस्कार उत्पन्न करती है । चित्रित वस्त्र के समान इस प्रकार के संस्कारों से युक्त हुआ वह मन अविद्या कामना और कर्म के कारण बाह्यसाधन की अपेक्षा के बिना ही प्रेरित होकर जाग्रत्सा भासने लगता है । ऐसा ही कहा भी है—“इस सर्वसाधनसम्पन्न लोक के संस्कार ग्रहण करके [स्वप्न देखता है]” इत्यादि । तथा आथर्वणश्रुति में भी [समस्त इन्द्रियाँ] “परम (इन्द्रियादि से उत्कृष्ट) देव (प्रकाशनशील) मन में एकरूप हो जाती हैं” इस प्रकार प्रस्तावना कर कहा है “यहाँ—स्वप्नावस्था में यह देव अपनी महिमा का अनुभव करता है ।”
अन्य इन्द्रियों की अपेक्षा मन अधिक अन्तःस्थ है, स्वप्नावस्था में जिसकी प्रज्ञा उस (मन)-की वासना के अनुरूप रहती है उसे अन्तःप्रज्ञ कहते हैं; वह अपनी विषयशून्य और केवल प्रकाशस्वरूप प्रज्ञा का विषयी (अनुभव करनेवाला) होने के कारण ‘तैजस’ कहा जाता है । विश्व बाह्यविषययुक्त होता है, इसलिये जागरित अवस्था में स्थूल प्रज्ञा उसकी भोज्य है । किन्तु तैजस के लिये केवल वासनामात्र प्रज्ञा भोजनीया है; इसलिये इसका भोग सूक्ष्म है । शेष अर्थ पहलेही के समान है । यह तैजस ही दूसरा पाद है ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स्वप्नः स्थानमस्य तैजसस्य स्वप्नस्थानः । जाग्रत्प्रज्ञानेकसाधना बहिर्विषयेवावभासमाना मनःस्पन्दनमात्रा सती तथाभूतं संस्कारं मनस्याधत्ते । तन्मनस्तथा संस्कृतं चित्रित इव पटो बाह्यसाधनानपेक्षमविद्याकामकर्मभिः प्रेर्यमाणं जाग्रद्वदवभासते । तथा चोक्तम्—“अस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय” (बृ० उ० ४ ।३ ।९) इति । तथा “परे देवे मनस्येकीभवति” (प्र० उ० ४ ।२) इति प्रस्तुत्य “अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति” (प्र० उ० ४ ।५) इत्याथर्वणे ।
इन्द्रियापेक्षयान्तःस्थत्वान्मनसस्तद्वासनारूपा च स्वप्ने प्रज्ञा यस्येत्यन्तःप्रज्ञः । विषयशून्यायां प्रज्ञायां केवलप्रकाशस्वरूपायां विषयित्वेन भवतीति तैजसः । विश्वस्य सविषयत्वेन प्रज्ञायाः स्थूलाया भोज्यत्वम् । इह पुनः केवला वासनामात्रा प्रज्ञा भोज्येति प्रविविक्तो भोग इति । समानमन्यत् । द्वितीयः पादस्तैजसः ॥ ४ ॥