आगम प्रकरण - मन्त्र 5

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम् ।
सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥

yatra supto na kañcana kāmaṃ kāmayate na kañcana svapnaṃ paśyati tatsuṣuptam .
suṣuptasthāna ekībhūtaḥ prajñānaghana evānandamayo hyānandabhukcetomukhaḥ prājñastṛtīyaḥ pādaḥ .. 5 ..


जिस अवस्था में सोया हुआ पुरुष किसी भोग की इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न ही देखता है उसे सुषुप्ति कहते हैं । वह सुषुप्ति जिसका स्थान है तथा जो एकीभूत प्रकृष्ट ज्ञानस्वरूप होता हुआ ही आनन्दमय, आनन्द का भोक्ता और चेतनारूप मुखवाला है वह प्राज्ञ ही तीसरा पाद है ॥ ५ ॥

जहाँ यानी जिस स्थान अथवा समय में सोया हुआ पुरुष न कोई स्वप्न देखता और न किसी भोग की ही इच्छा करता है, क्योंकि सुषुप्तावस्था में पहली दोनों अवस्थाओं के समान अन्यथा ग्रहणरूप स्वप्नदर्शन अथवा किसी प्रकार की कामना नहीं होती, वह यह सुषुप्तावस्था ही जिसका स्थान है उसे सुषुप्तस्थान कहते हैं ।

जिस प्रकार रात्रि के अन्धकार से दिन आच्छादित हो जाता है उसी प्रकार पूर्वोक्त दोनों स्थानों में विभिन्न रूप से प्रतीत होनेवाला मन का स्फुरणरूप द्वैतसमूह [इस अवस्था में] प्रपञ्च के सहित अपने उस (विशिष्ट) स्वरूप का त्याग न कर अज्ञान से आच्छादित हो जाता है; इसलिये इसे ‘एकीभूत’ ऐसा कहा जाता है । अतः जिस अवस्था में स्वप्न और जाग्रत्—ये मन के स्फुरणरूप प्रज्ञान घनीभूत-से हो जाते हैं, वह यह अवस्था अविवेकरूपा होने के कारण प्रज्ञानघन कही जाती है । जिस प्रकार रात्रि में रात्रि के अन्धकार से पृथक्त्व की प्रतीति न होने के कारण सम्पूर्ण प्रपञ्च घनीभूत-सा जान पड़ता है उसी प्रकार यह प्रज्ञानघन ही है । ‘एव’ शब्द से यह तात्पर्य है कि उस समय प्रज्ञान के सिवा कोई अन्य जाति नहीं रहती ।

मन का जो विषय और विषयीरूप से स्फुरित होने के आयास का दुःख है उसका अभाव होने के कारण यह आनन्दमय अर्थात् आनन्दबहुल है; केवल आनन्दमात्र ही नहीं है, क्योंकि इस अवस्था में आनन्द की आत्यन्तिकता नहीं है; जिस प्रकार लोक में अनायासरूप से स्थित पुरुष सुखी या आनन्द भोग करनेवाला कहा जाता है, उसी प्रकार, क्योंकि इस अवस्था में यह आत्मा इस अत्यन्त अनायासरूपा स्थिति का अनुभव करता है, इसलिये यह आनन्दभुक् कहा जाता है; जैसा कि “यह इसका परम आनन्द है” इस श्रुति से सिद्ध होता है ।

स्वप्नादिज्ञानरूप चेतना के प्रति द्वारस्वरूप होने के कारण यह चेतोमुख है । अथवा स्वप्नादि की प्राप्ति के लिये ज्ञानस्वरूप चित्त ही इसका द्वार यानी मुख है, इसलिये यह चेतोमुख है । भूत-भविष्यत् का तथा सम्पूर्ण विषयों का ज्ञाता यही है, इसलिये यह प्राज्ञ है । सुषुप्त होने पर भी इसे भूतपूर्वगति से ‘प्राज्ञ’ कहा जाता है । अथवा केवल प्रज्ञप्ति (ज्ञान)-मात्र इसीका असाधारणरूप है, इसलिये यह प्राज्ञ है, क्योंकि दूसरों को (विश्व और तैजस को) तो विशिष्ट विज्ञान भी होता है । वह यह प्राज्ञ ही तीसरा पाद है ॥ ५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यत्र यस्मिन्स्थाने काले वा सुप्तो न कञ्चन स्वप्नं पश्यति न कञ्चन कामं कामयते । न हि सुषुप्ते पूर्वयोरिवान्यथाग्रहणलक्षणं स्वप्नदर्शनं कामो वा कञ्चन विद्यते । तदेतत्सुषुप्तं स्थानमस्येति सुषुप्तस्थानः ।

स्थानद्वयप्रविभक्तं मनःस्पन्दितं द्वैतजातं तथारूपापरित्यागे- नाविवेकापन्नं नैशतमोग्रस्तमिवाहःसप्रपञ्चमेकीभूतमित्युच्यते । अत एव स्वप्नजाग्रन्मनःस्पन्दनानि प्रज्ञानानि घनीभूतानीव सेयमवस्थाविवेकरूपत्वात्प्रज्ञानघन उच्यते । यथा रात्रौ नैशेन तमसाविभज्यमानं सर्वं घनमिव तद्वत्प्रज्ञानघन एव । एवशब्दान्न जात्यन्तरं प्रज्ञानव्यतिरेकेणास्तीत्यर्थः ।

मनसो विषयविषय्याकारस्पन्दनायासदुःखाभावादानन्दमय आनन्दप्रायो नानन्द एव । अनात्यन्तिकत्वात् । यथा लोके निरायासस्थितः सुख्यानन्दभुगुच्यते, अत्यन्तानायासरूपा हीयं स्थितिरनेनानुभूयत इत्यानन्दभुक्, “एषोऽस्य परम आनन्दः” (बृ० उ० ४ । ३ । ३२) इति श्रुतेः ।

स्वप्नादिप्रतिबोधचेतः प्रति द्वारीभूतत्वाच्चेतोमुखः । बोधलक्षणं वा चेतो द्वारं मुखमस्य स्वप्नाद्यागमनं प्रतीति चेतोमुखः । भूतभविष्यज्ज्ञातृत्वं सर्वविषयज्ञातृत्वमस्यैवेति प्राज्ञः । सुषुप्तोऽपि हि भूतपूर्वगत्या प्राज्ञ उच्यते । अथ वा प्रज्ञप्तिमात्रमस्यैवासाधारणं रूपमिति प्राज्ञः, इतरयोर्विशिष्टमपि विज्ञानमस्ति । सोऽयं प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥