एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥
eṣa sarveśvara eṣa sarvajña eṣo’ntaryāmyeṣa yoniḥ sarvasya prabhavāpyayau hi bhūtānām .. 6 ..
यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह अन्तर्यामी है और समस्त जीवों की उत्पत्ति तथा लय का स्थान होने के कारण यह सबका कारण भी है ॥ ६ ॥
अपने स्वरूप में स्थित यह (प्राज्ञ) ही सर्वेश्वर है, अर्थात् अधिदैव के सहित सम्पूर्ण भेदसमूह का ईश्वर—ईशन (शासन) करनेवाला है । “हे सोम्य! यह मन (जीव) प्राण (प्राणसंज्ञक ब्रह्म)-रूप बन्धनवाला है” इस श्रुति से अन्य मतावलम्बियों के सिद्धान्तानुसार [सर्वज्ञ परमेश्वर] इस प्राज्ञ से कोई विजातीय पदार्थ नहीं है । सम्पूर्ण भेद में स्थित हुआ यही सबका ज्ञाता है; इसलिये यह सर्वज्ञ है । [अतएव] यह अन्तर्यामी है अर्थात् समस्त प्राणियों के भीतर अनुप्रविष्ट होकर उनका नियमन करनेवाला भी यही है । इसीसे पूर्वोक्त भेद के सहित सारा जगत् उत्पन्न होता है; इसलिये यही सबका कारण है । क्योंकि ऐसा है, इसलिये यही समस्त प्राणियों का उत्पत्ति और लयस्थान भी है ॥ ६ ॥
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एष हि स्वरूपावस्थः सर्वेश्वरः साधिदैविकस्य भेदजातस्य सर्वस्येशिता नैतस्माज्जात्यन्तरभूतोऽन्येषामिव । “प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः” (छा० उ० ६ । ८ । २) इति श्रुतेः । अयमेव हि सर्वस्य सर्वभेदावस्थो ज्ञातेत्येष सर्वज्ञः । एषोऽन्तर्याम्यन्तरनुप्रविश्य सर्वेषां भूतानां नियन्ताप्येष एव । अत एव यथोक्तं सभेदं जगत्प्रसूयत इत्येष योनिः सर्वस्य । यत एवं प्रभवश्चाप्ययश्च प्रभवाप्ययौ हि भूतानामेष एव ॥ ६ ॥
एक ही आत्मा के तीन भेद
अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थ में ये श्लोक हैं—
यहाँ इस पूर्वोक्त अर्थ में ये श्लोक हैं—
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अत्रैतस्मिन्यथोक्तेऽर्थ एते श्लोका भवन्ति ।