बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ १ ॥
घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ १ ॥
bahiṣprajño vibhurviśvo hyantaḥprajñastu taijasaḥ .
ghanaprajñastathā prājña eka eva tridhā smṛtaḥ .. 1 ..
विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ (प्रज्ञानघन) है । इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है ॥ १ ॥
बहिष्प्रज्ञ इत्यादि । इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि क्रमशः तीन स्थानोंवाला होने से और ‘मैं वही हूँ’ इस प्रकार की स्मृतिद्वारा अनुसन्धान किया जाने के कारण आत्मा का तीनों स्थानों से पृथक्त्व, एकत्व, शुद्धत्व और असंगत्व सिद्ध होता है, जैसा कि महामत्स्यादि दृष्टान्त का वर्णन करनेवाली श्रुति[ * ] बतलाती है ॥ १ ॥
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बहिष्प्रज्ञ इति । पर्यायेण त्रिस्थानत्वात्सोऽहमिति स्मृत्या प्रतिसन्धानाच्च स्थानत्रयव्यतिरिक्तत्वमेकत्वं शुद्धत्वमसङ्गत्वं च सिद्धमित्यभिप्रायः । महामत्स्यादिदृष्टान्तश्रुतेः ॥ १ ॥
विश्वादि के विभिन्न स्थान
जाग्रत्-अवस्था में ही विश्व आदि तीनों का अनुभव दिखलाने के लिये यह श्लोक कहा जाता है—
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जागरितावस्थायामेव विश्वादीनां त्रयाणामनुभवप्रदर्शनार्थोऽयं श्लोकः-