वैतथ्य प्रकरण - कारिका 1

वैतथ्यं सर्वभावानां स्वप्न आहुर्मनीषिणः ।
अन्तःस्थानात्तु भावानां संवृतत्वेन हेतुना ॥ १ ॥

vaitathyaṃ sarvabhāvānāṃ svapna āhurmanīṣiṇaḥ .
antaḥsthānāttu bhāvānāṃ saṃvṛtatvena hetunā .. 1 ..


[स्वप्नावस्था में] सब पदार्थ शरीर के भीतर स्थित होते हैं; अतः स्थान के सङ्कोच के कारण मनीषीगण स्वप्न में सब पदार्थों का मिथ्यात्व प्रतिपादन करते हैं ॥ १ ॥

वितथ (मिथ्या)-के भाव का नाम ‘वैतथ्य’ अर्थात् असत्यत्व है । किसका वैतथ्य? स्वप्न में प्रतीत होनेवाले सम्पूर्ण बाह्य और आन्तरिक पदार्थों का मनीषीगण अर्थात् प्रमाणकुशल पुरुष वैतथ्य बतलाते हैं । उनके मिथ्यात्व में हेतु बतलाते हैं—

अन्तःस्थ होने के कारण; अन्तर अर्थात् शरीर के मध्य में स्थान है जिनका [ऐसे होने के कारण]; क्योंकि वहीं पर्वत एवं हस्ती आदि समस्त पदार्थ उपलब्ध होते हैं, शरीर से बाहर उनकी उपलब्धि नहीं होती; इसलिये वे मिथ्या होने चाहिये । किन्तु [यदि शरीर के भीतर उपलब्ध होने के कारण ही स्वप्नदृष्ट पदार्थ मिथ्या हैं तो] गृह आदि के भीतर दिखायी देनेवाले घट आदि में तो यह हेतु व्यभिचरित हो जायगा [क्योंकि वहाँ जो उनकी प्रतीति है वह तो सत्य ही है]—ऐसी शङ्का होने पर कहते हैं—‘स्थान के सङ्कोच के कारण से ।’ तात्पर्य यह कि शरीर के भीतर संकुचित स्थान होने से [उनका मिथ्यात्व कहा जाता है] । देह के अन्तर्वर्ती संकुचित नाडीजाल में पर्वत या हाथी आदि का होना सम्भव नहीं है । देह के भीतर पर्वत नहीं हो सकता ॥ १ ॥

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वितथस्य भावो वैतथ्यम्, असत्यत्वमित्यर्थः । कस्य? सर्वेषां बाह्याध्यात्मिकानां भावानां पदार्थानां स्वप्न उपलभ्यमानानाम्, आहुः कथयन्ति, मनीषिणः प्रमाणकुशलाः । वैतथ्ये हेतुमाह—

अन्तःस्थानात्, अन्तः शरीरस्य अन्तः संवृत- मध्ये स्थानं येषाम् । स्थानात् तत्र हि भावा उपलभ्यन्ते पर्वतहस्त्यादयो न बहिः शरीरात् । तस्मात्ते वितथा भवितुमर्हन्ति । नन्वपवरकाद्यन्तरुपलभ्यमानैर्घटादिभिरनैकान्तिको हेतुरित्याशङ्क्याह— संवृतत्वेन हेतुनेति, अन्तः संवृतस्थानादित्यर्थः । न ह्यन्तः संवृते देहान्तर्नाडीषु पर्वतहस्त्यादीनां सम्भवोऽस्ति; न हि देहे पर्वतोऽस्ति ॥ १ ॥


स्वप्न में दिखलायी देनेवाले पदार्थों का शरीर के भीतर संकुचित स्थान है—यह बात सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि पूर्व दिशा में सोया हुआ पुरुष उत्तर दिशा में स्वप्न देखता-सा देखा जाता है [अतः वह शरीर से बाहर वहाँ जाकर उन्हें देखता होगा]—ऐसी आशङ्का करके कहते हैं—
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स्वप्नदृश्यानां भावानामन्तः संवृतस्थानमित्येतदसिद्धम्, यस्मात् प्राच्येषु सुप्त उदक्षु स्वप्नान्पश्यन्निव दृश्यत इत्येतदाशङ्क्याह—