जाग्रद्वृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत् ।
बहिश्चेतोगृहीतं सद्युक्तं वैतथ्यमेतयोः ॥ १० ॥
बहिश्चेतोगृहीतं सद्युक्तं वैतथ्यमेतयोः ॥ १० ॥
jāgradvṛttāvapi tvantaścetasā kalpitaṃ tvasat .
bahiścetogṛhītaṃ sadyuktaṃ vaitathyametayoḥ .. 10 ..
इसी प्रकार जाग्रदवस्था में भी चित्त के भीतर कल्पना किया हुआ पदार्थ असत् तथा चित्त से बाहर ग्रहण किया हुआ पदार्थ सत् समझा जाता है । परन्तु इन दोनोंही का मिथ्यात्व मानना उचित है ॥ १० ॥
इन सत् और असत् पदार्थों का मिथ्यात्व ठीक ही है, क्योंकि हृदय के भीतर या बाहर कल्पित होने से उनमें कोई विशेषता नहीं होती । शेष सबकी व्याख्या हो चुकी है ॥ १० ॥
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सदसतोर्वैतथ्यं युक्तम्, अन्तर्बहिश्चेतःकल्पितत्वाविशेषादिति व्याख्यातमन्यत् ॥ १० ॥
इन मिथ्या पदार्थों की कल्पना करनेवाला कौन है?
[इसपर] पूर्वपक्षी कहता है—
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चोदक आह—