कल्पयत्यात्मनात्मानमात्मा देवः स्वमायया ।
स एव बुध्यते भेदानिति वेदान्तनिश्चयः ॥ १२ ॥
स एव बुध्यते भेदानिति वेदान्तनिश्चयः ॥ १२ ॥
kalpayatyātmanātmānamātmā devaḥ svamāyayā .
sa eva budhyate bhedāniti vedāntaniścayaḥ .. 12 ..
स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी माया से स्वयं ही कल्पना करता है और वही सब भेदों को जानता है—यही वेदान्त का निश्चय है ॥ १२ ॥
स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी माया से रज्जु में सर्पादि के समान अपने में आपही को आगे बतलाये जानेवाले भेदरूप से कल्पना करता है और स्वयं ही उन भेदों को जानता है—इस प्रकार यही वेदान्त का निश्चय है । उसके सिवा स्मृति और ज्ञान का कोई और आश्रय नहीं है । तात्पर्य यह कि वैनाशिकों (बौद्धों)- के कथन के समान ये ज्ञान और स्मृति निराधार नहीं हैं ॥ १२ ॥
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स्वयं स्वमायया स्वमात्मानमात्मा देव आत्मन्येव वक्ष्यमाणं भेदाकारं कल्पयति रज्ज्वादाविव सर्पादीन् स्वयमेव च तान्बुध्यते भेदांस्तद्वदेवेत्येवं वेदान्तनिश्चयः । नान्योऽस्ति ज्ञानस्मृत्याश्रयः । न च निरास्पदे एव ज्ञानस्मृती वैनाशिकानामिवेत्यभिप्रायः ॥ १२ ॥
पदार्थकल्पना की विधि
वह संकल्प करते हुए किस प्रकार कल्पना करता है? सो बतलाया जाता है—
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सङ्कल्पयन्केन प्रकारेण कल्पयतीत्युच्यते—