वैतथ्य प्रकरण - कारिका 13

विकरोत्यपरान्भावानन्तश्चित्ते व्यवस्थितान् ।
नियतांश्च बहिश्चित्त एवं कल्पयते प्रभुः ॥ १३ ॥

vikarotyaparānbhāvānantaścitte vyavasthitān .
niyatāṃśca bahiścitta evaṃ kalpayate prabhuḥ .. 13 ..


प्रभु आत्मा अपने अन्तःकरण में [वासनारूप से] स्थित अन्य (लौकिक) भावों को नानारूप करता है तथा बहिश्चित्त होकर पृथिवी आदि नियत और अनियत पदार्थों की भी इसी प्रकार कल्पना करता है ॥ १३ ॥
वह चित्त के भीतर वासनारूप से स्थित अव्याकृत लौकिक भावों—शब्दादि पदार्थों को तथा अन्य पृथिवी आदि नियत और कल्पनाकाल में ही उत्पन्न होनेवाले अनियत पदार्थों को बहिश्चित्त होकर एवं मनोरथादिरूप पदार्थों को अन्तश्चित्त होकर विकृत करता अर्थात् नाना करता है—इस प्रकार प्रभु—ईश्वर अर्थात् आत्मा कल्पना करता है ॥ १३ ॥
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विकरोति नाना करोत्यपरान् लौकिकान् भावान् पदार्थान् शब्दादीनन्यांश्चान्तश्चित्ते वासनारूपेण व्यवस्थितानव्याकृतान् नियतांश्च पृथ्व्यादीननियतांश्च कल्पनाकालान्बहिश्चित्तः संस्तथान्तश्चित्तो मनोरथादिलक्षणानित्येवं कल्पयति प्रभुरीश्वर आत्मेत्यर्थः ॥ १३ ॥

आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकार के पदार्थ मिथ्या हैं

स्वप्न के समान सब कुछ चित्त का ही कल्पना किया हुआ है—इस विषय में यह शंका होती है—क्योंकि केवल चित्तपरिकल्पित और चित्त से ही परिच्छेद्य मनोरथादि से बाह्य पदार्थों की अन्योन्यपरिच्छेद्यत्वरूप विलक्षणता है [अतः स्वप्न के समान ये मिथ्या नहीं हो सकते] ।

समाधान—यह शङ्का ठीक नहीं है, [क्योंकि—]

संस्कृत भाष्य पढ़ें

स्वप्नवच्चित्तपरिकल्पितं सर्वमित्येतदाशङ्क्यते । यस्माच्चित्तपरिकल्पितैर्मनोरथादिलक्षणैश्चित्तपरिच्छेद्यैर्वैलक्षण्यं बाह्यानामन्योन्यपरिच्छेद्यत्वमिति ।

सा न युक्ताशङ्का ।