कल्पिता एव ते सर्वे विशेषो नान्यहेतुकः ॥ १४ ॥
cittakālā hi ye’ntastu dvayakālāśca ye bahiḥ .
kalpitā eva te sarve viśeṣo nānyahetukaḥ .. 14 ..
जो आन्तरिक हैं अर्थात् चित्तपरिच्छेद्य हैं वे चित्तकाल हैं; जिनका चित्तकाल के सिवा और कोई काल परिच्छेदक न हो उन्हें चित्तकाल कहते हैं । अर्थात् वे केवल कल्पना के समय ही उपलब्ध होते हैं । तथा बाह्य पदार्थ दो कालवाले—भेदकालिक यानी अन्योन्यपरिच्छेद्य हैं । जैसे गोदोहनपर्यन्त बैठता है; यानी जबतक बैठता है तबतक गौ दुहता है और जबतक गौ दुहता है तबतक बैठता है । उतने समयतक यह रहता है और इतने समयतक वह रहता है—इस प्रकार बाह्य पदार्थों का परस्पर परिच्छेद्य-परिच्छेदकत्व है; अतः वे दो कालवाले हैं । किन्तु आन्तरिक चित्तकालिक और बाह्य द्विकालिक—ये सब कल्पित ही हैं ।
बाह्य पदार्थों की जो द्विकालिकत्वरूप विशेषता है वह कल्पितत्व के सिवा किसी अन्य कारण से नहीं है । इस विषय में भी स्वप्न का दृष्टान्त है ही ॥ १४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
चित्तकाला हि येऽन्तस्तु चित्तपरिच्छेद्याः; नान्यश्चित्तकालव्यतिरेकेण परिच्छेदकः कालो येषां ते चित्तकालाः । कल्पनाकाल एवोपलभ्यन्त इत्यर्थः । द्वयकालाश्च भेदकाला अन्योन्यपरिच्छेद्याः । यथा गोदोहनमास्ते; यावदास्ते तावद्गां दोग्धि यावद्गां दोग्धि तावदास्ते । तावानयमेतावान्स इति परस्परपरिच्छेद्यपरिच्छेदकत्वं बाह्यानां भेदानां ते द्वयकालाः । अन्तश्चित्तकाला बाह्याश्च द्वयकालाः कल्पिता एव ते सर्वे । न बाह्यो द्वयकालत्वविशेषः कल्पितत्वव्यतिरेकेणान्यहेतुकः ।
अत्रापि हि स्वप्नदृष्टान्तो भवत्येव ॥ १४ ॥