वैतथ्य प्रकरण - कारिका 15

अव्यक्ता एव येऽन्तस्तु स्फुटा एव च ये बहिः ।
कल्पिता एव ते सर्वे विशेषस्त्विन्द्रियान्तरे ॥ १५ ॥

avyaktā eva ye’ntastu sphuṭā eva ca ye bahiḥ .
kalpitā eva te sarve viśeṣastvindriyāntare .. 15 ..


जो आन्तरिक पदार्थ हैं वे अव्यक्त ही हैं और जो बाह्य हैं वे स्पष्ट प्रतीत होनेवाले हैं । किन्तु वे सब हैं कल्पित ही । उनकी विशेषता तो केवल इन्द्रियों के ही भेद में है ॥ १५ ॥
चित्त की वासनामात्र से अभिव्यक्त हुए पदार्थों का जो अन्तःकरण में अव्यक्तत्व (अस्फुटत्व) और बाह्य चक्षु आदि अन्य इन्द्रियों में जो उनका स्फुटत्व है वह विशेषता पदार्थों की सत्ता के कारण नहीं है, क्योंकि ऐसा ही स्वप्न में भी देखा जाता है । तो फिर इसका क्या कारण है? यह इन्द्रियों के भेद के ही कारण है । अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्न के पदार्थों के समान जाग्रत्कालीन पदार्थ भी कल्पित ही हैं ॥ १५ ॥
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यदप्यन्तरव्यक्तत्वं भावानां मनोवासनामात्राभिव्यक्तानां स्फुटत्वं वा बहिश्चक्षुरादीन्द्रियान्तरे विशेषो नासौ भेदानामस्तित्वकृतः स्वप्नेऽपि तथा दर्शनात् । किं तर्हि? इन्द्रियान्तरकृत एव । अतः कल्पिता एव जाग्रद्भावा अपि स्वप्नभाववदिति सिद्धम् ॥ १५ ॥

पदार्थकल्पना की मूल जीवकल्पना है

बाह्य और आन्तरिक पदार्थों की परस्पर निमित्त और नैमित्तिकरूप से कल्पना होने में क्या कारण है? सो बतलाया जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
बाह्याध्यात्मिकानां भावानामितरेतरनिमित्तनैमित्तिकतया कल्पनायां किं मूलमित्युच्यते—