वैतथ्य प्रकरण - कारिका 16

जीवं कल्पयते पूर्वं ततो भावान्पृथग्विधान् ।
बाह्यानाध्यात्मिकांश्चैव यथाविद्यस्तथास्मृतिः ॥ १६ ॥

jīvaṃ kalpayate pūrvaṃ tato bhāvānpṛthagvidhān .
bāhyānādhyātmikāṃścaiva yathāvidyastathāsmṛtiḥ .. 16 ..


[वह प्रभु] सबसे पहले जीव की कल्पना करता है; फिर तरह-तरह के बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थों की कल्पना करता है । उस जीव का जैसा विज्ञान होता है वैसी ही स्मृति भी होती है ॥ १६ ॥

सबसे पहले ‘मैं करता हूँ, मुझे सुख-दुःख हैं’ इस प्रकार के हेतुफलात्मक जीव की [वह प्रभु] इससे विपरीत लक्षणों वाले शुद्ध आत्मा में रज्जु में सर्प के समान कल्पना करता है । फिर उसीके लिये क्रिया, कारक और फल के भेद से प्राण आदि नाना प्रकार के बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थों की कल्पना करता है ।

उस कल्पना में क्या हेतु है—इसपर कहा जाता है—यह जो स्वयं कल्पना किया हुआ जीव सब प्रकार की कल्पना का अधिकारी है, वह जैसी विद्यावाला होता है अर्थात् उसकी जैसी विद्या यानी विज्ञान होता है वैसी ही स्मृति भी होती है । अतः वह वैसी ही स्मृतिवाला होता है । इस प्रकार [अन्नभक्षणादि] हेतु की कल्पना के विज्ञान से ही [तृप्ति आदि] फल का विज्ञान होता है; उससे [दूसरे दिन भी] उन हेतु और फल की स्मृति होती है और उस स्मृति से उनका ज्ञान तथा उनके लिये होनेवाले [पाकादि] कर्म, [तण्डुलादि] कारक और उनके [तृप्ति आदि] फलभेद के ज्ञान होते हैं ।

उनसे उनकी स्मृति होती है तथा उस स्मृति से फिर उन [हेतु आदि]-के विज्ञान होते हैं । इस प्रकार यह जीव बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थों की पारस्परिक निमित्त-नैमित्तिकभाव से अनेक प्रकार कल्पना करता है ॥ १६ ॥

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जीवं हेतुफलात्मकम्; अहं करोमि मम सुखदुःखे इत्येवंलक्षणम्; अनेवंलक्षण एव शुद्ध आत्मनि रज्जाविव सर्पं कल्पयते पूर्वम् । ततस्तादर्थ्येन क्रियाकारकफलभेदेन प्राणादीन्नानाविधान्भावान्बाह्यानाध्यात्मिकांश्चैव कल्पते ।

तत्र कल्पनायां को हेतुरित्युच्यते । योऽसौ स्वयंकल्पितो जीवः सर्वकल्पनायामधिकृतः स यथाविद्यः, यादृशी विद्या विज्ञानमस्येति यथाविद्यः; तथाविधैव स्मृतिस्तस्येति तथास्मृतिर्भवति स इति । अतो हेतुकल्पनाविज्ञानात्फलविज्ञानं ततो हेतुफलस्मृतिस्ततस्तद्विज्ञानं तदर्थक्रियाकारकतत्फलभेदविज्ञानानि ।

तेभ्यस्तत्स्मृतिस्तत्स्मृतेश्च पुनस्तद्विज्ञानानीत्येवं बाह्यानाध्यात्मिकांश्चेतरेतरनिमित्तनैमित्तिकभावेनानेकधा कल्पयते ॥ १६ ॥


जीवकल्पना का हेतु अज्ञान है

यहाँतक जीवकल्पना ही सब कल्पनाओं का मूल है—यह कहा गया; किन्तु वह जीव-कल्पना है किस निमित्त से? —इस बात का दृष्टान्त से प्रतिपादन करते हैं—
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तत्र जीवकल्पना सर्वकल्पनामूलमित्युक्तं सैव जीवकल्पना किं निमित्तेति दृष्टान्तेन प्रतिपादयति—