वैतथ्य प्रकरण - कारिका 17

अनिश्चिता यथा रज्जुरन्धकारे विकल्पिता ।
सर्पधारादिभिर्भावैस्तद्वदात्मा विकल्पितः ॥ १७ ॥

aniścitā yathā rajjurandhakāre vikalpitā .
sarpadhārādibhirbhāvaistadvadātmā vikalpitaḥ .. 17 ..


जिस प्रकार [अपने स्वरूप से] निश्चय न की हुई रज्जु अन्धकार में सर्पधारा आदि भावों से कल्पना की जाती है उसी प्रकार आत्मा में भी तरह-तरह की कल्पनाएँ हो रही हैं ॥ १७ ॥
जिस प्रकार अपने स्वरूप से अनिश्चित अर्थात् यह ऐसी ही है—इस प्रकार निर्धारण न की हुई रज्जु मन्द अन्धकार में ‘यह सर्प है? ’ ‘जल की धारा है? ’ अथवा ‘दण्ड है? ’ इस प्रकार—पहलेसे स्वरूप का निश्चय न होने के कारण—अनेक प्रकार से कल्पना की जाती है; यदि रज्जु पहले ही अपने स्वरूप से निश्चित हो तो उसमें सर्पादि का विकल्प नहीं हो सकता, जैसे कि अपने हाथ की अँगुली आदि में [ऐसा कोई विकल्प नहीं होता] । यह एक दृष्टान्त है । इसी तरह हेतु-फलादि सांसारिक धर्मरूप अनर्थ से विलक्षण अपने विशुद्ध विज्ञप्तिमात्र अद्वितीय सत्तास्वरूप से निश्चित न होने के कारण ही आत्मा जीव एवं प्राण आदि अनन्त विभिन्न भावों से विकल्पित हो रहा है—यही सम्पूर्ण उपनिषदों का सिद्धान्त है ॥ १७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यथा लोके स्वेन रूपेणानिश्चितानवधारितैवमेवेति रज्जुर्मन्दान्धकारे किं सर्प उदकधारा दण्ड इति वानेकधा विकल्पिता भवति पूर्वं स्वरूपानिश्चयनिमित्तम् । यदि हि पूर्वमेव रज्जुः स्वरूपेण निश्चिता स्यात्; न सर्पादिविकल्पोऽभविष्यद्यथा स्वहस्ताङ्गुल्यादिषु, एष दृष्टान्तः । तद्वद्धेतुफलादिसंसारधर्मानर्थविलक्षणतया स्वेन विशुद्धविज्ञप्तिमात्रसत्ताद्वयरूपेणानिश्चितत्वाज्जीवप्राणाद्यनन्तभावभेदैरात्मा विकल्पित इत्येष सर्वोपनिषदां सिद्धान्तः ॥ १७ ॥