वैतथ्य प्रकरण - कारिका 18

निश्चितायां यथा रज्ज्वां विकल्पो विनिवर्तते ।
रज्जुरेवेति चाद्वैतं तद्वदात्मविनिश्चयः ॥ १८ ॥

niścitāyāṃ yathā rajjvāṃ vikalpo vinivartate .
rajjureveti cādvaitaṃ tadvadātmaviniścayaḥ .. 18 ..


जिस प्रकार रज्जु का निश्चय हो जाने पर उसमें [सर्पादि का] विकल्प निवृत्त हो जाता है तथा ‘यह रज्जु ही है’ ऐसा अद्वैत निश्चय होता है उसी प्रकार आत्मा का निश्चय है ॥ १८ ॥
‘यह रज्जु ही है’ ऐसा निश्चय होने से सर्पादि विकल्प की निवृत्ति हो जाने पर जिस प्रकार ‘यह रज्जु ही है’ ऐसा अद्वैतभाव हो जाता है उसी प्रकार “नेति-नेति” इस सर्वसंसारधर्मशून्य आत्मा का प्रतिपादन करनेवाले शास्त्र से उत्पन्न हुए विज्ञानरूप सूर्य के प्रकाश से आत्मा का ऐसा निश्चय होता है कि “यह सब आत्मा ही है” “वह कारण-कार्य से रहित और अन्तर्बाह्यशून्य है” “बाहर-भीतर से (कार्य-कारण दोनों दृष्टियों से) अजन्मा है” “वह जराशून्य, अमर, अमृत और अभय है” तथा “वह एक अद्वितीय ही है” ॥ १८ ॥
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रज्जुरेवेति निश्चये सर्वविकल्पनिवृत्तौ रज्जुरेवेति चाद्वैतं यथा तथा “नेति नेति” (बृ० उ० ४ । ४ । २२) इति सर्वसंसारधर्मशून्यप्रतिपादकशास्त्रजनितविज्ञानसूर्यालोककृतात्मविनिश्चयः “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) “अपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यम्” (बृ० उ० २ ।५ ।१९) “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” (मु० उ० २ ।१ ।२) “अजरोऽमरोऽमृतोऽभयः” (बृ० उ० ४ ।४ ।२५) “एक एवाद्वयः” इति ॥ १८ ॥

यदि यह बात निश्चित है कि आत्मा एक ही है तो वह इन संसाररूप प्राणादि अनन्त भावों से कैसे विकल्पित हो रहा है? सो इस विषय में कहा जाता है, सुनो—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यद्यात्मैक एवेति निश्चयः कथं प्राणादिभिरनन्तैर्भावैरेतैः संसारलक्षणैर्विकल्पित इति, उच्यते, शृणु—