प्राणादिभिरनन्तैश्च भावैरेतैर्विकल्पितः ।
मायैषा तस्य देवस्य यया संमोहितः स्वयम् ॥ १९ ॥
मायैषा तस्य देवस्य यया संमोहितः स्वयम् ॥ १९ ॥
prāṇādibhiranantaiśca bhāvairetairvikalpitaḥ .
māyaiṣā tasya devasya yayā saṃmohitaḥ svayam .. 19 ..
यह जो इन प्राणादि अनन्त भावों से विकल्पित हो रहा है सो यह उस प्रकाशमय आत्मदेव की माया ही है, जिससे कि वह स्वयं ही मोहित हो रहा है ॥ १९ ॥
यह उस आत्मदेव की माया है । जिस प्रकार मायावीद्वारा प्रयोग की हुई माया अति निर्मल आकाश को पल्लवयुक्त पुष्पित पादपों से परिपूर्ण कर देती है उसी प्रकार यह भी उस देव की माया है जिससे कि यह स्वयं भी मोहित हुए के समान मोहग्रस्त हो रहा है । “मेरी माया का पार पाना कठिन है” ऐसा [भगवान् ने] कहा भी है ॥ १९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
मायैषा तस्यात्मनो देवस्य । यथा मायाविना विहिता माया गगनमतिविमलं कुसुमितैः सपलाशैस्तरुभिराकीर्णमिव करोति तथेयमपि देवस्य माया ययायं स्वयमपि मोहित इव मोहितो भवति । “मम माया दुरत्यया” (गीता ७ । १४) इत्युक्तम् ॥ १९ ॥