वैतथ्य प्रकरण - कारिका 2

अदीर्घत्वाच्च कालस्य गत्वा देशान्न पश्यति ।
प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥ २ ॥

adīrghatvācca kālasya gatvā deśānna paśyati .
pratibuddhaśca vai sarvastasmindeśe na vidyate .. 2 ..


समय की अदीर्घता होने के कारण वह देह से बाहर जाकर उन्हें नहीं देखता तथा जागने पर भी कोई पुरुष उस देश में विद्यमान नहीं रहता । [इससे भी उसका स्वप्नदृष्ट देश में न जाना ही सिद्ध होता है] ॥ २ ॥

वह देह से बाहर देशान्तर में जाकर स्वप्न नहीं देखता, क्योंकि वह सोया हुआ ही देह के स्थान से एक मास में पहुँचने योग्य सौ योजन की दूरी पर स्वप्न देखता-सा देखा जाता है । [उस समय] उस देश में पहुँचने और वहाँ से लौटने योग्य दीर्घकाल है ही नहीं । अतः काल की अदीर्घता के कारण वह स्वप्नद्रष्टा किसी देशान्तर में नहीं जाता ।

यही नहीं, जागने पर भी कोई स्वप्नद्रष्टा स्वप्न देखने के स्थान में नहीं रहता । यदि वह स्वप्न के समय किसी देशान्तर में जाता तो जिस देश में स्वप्न देखता उसी में जागता । किन्तु ऐसी बात नहीं होती । वह रात्रि में सोया हुआ मानो दिन में पदार्थों को देखता है और बहुतों से मिलता है; अतः जिनसे उसका मेल होता है उनके द्वारा वह गृहीत होना चाहिये था । परन्तु गृहीत होता नहीं; यदि गृहीत होता तो ‘हमने तुझे वहाँ पाया था’ ऐसा कहते । परन्तु ऐसी बात है नहीं; अतः स्वप्न में वह किसी देशान्तर को नहीं जाता ॥ २ ॥

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न देहाद्बहिर्देशान्तरं गत्वा दीर्घ- स्वप्नान्पश्यति । यस्मात्कालाभावाद् सुप्तमात्र एव देहमिथ्यात्वम् देशाद्योजनशतान्तरिते मासमात्रप्राप्ये देशे स्वप्नान्पश्यन्निव दृश्यते । न च तद्देशप्राप्तेरागमनस्य च दीर्घः कालोऽस्ति । अतोऽदीर्घत्वाच्च कालस्य न स्वप्नदृग्देशान्तरं गच्छति ।

किं च प्रतिबुद्धश्च वै सर्वः स्वप्नदृक्स्वप्नदर्शनदेशे न विद्यते । यदि च स्वप्ने देशान्तरं गच्छेद्यस्मिन्देशे स्वप्नान्पश्येत्तत्रैव प्रतिबुध्येत । न चैतदस्ति । रात्रौ सुप्तोऽहनीव भावान्पश्यति; बहुभिः संगतो भवति, यैश्च संगतस्तैर्गृह्येत । न च गृह्यते; गृहीतश्चेत्वामद्य तत्रोपलब्धवन्तो वयमिति ब्रूयुः । न चैतदस्ति, तस्मान्न देशान्तरं गच्छति स्वप्ने ॥ २ ॥


स्वप्न में दिखायी देनेवाले पदार्थ इसलिये भी मिथ्या हैं, क्योंकि—
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इतश्च स्वप्नदृश्या भावा वितथा यतः—