वैतथ्य प्रकरण - कारिका 20

प्राण इति प्राणविदो भूतानीति च तद्विदः ।
गुणा इति गुणविदस्तत्त्वानीति च तद्विदः ॥ २० ॥

prāṇa iti prāṇavido bhūtānīti ca tadvidaḥ .
guṇā iti guṇavidastattvānīti ca tadvidaḥ .. 20 ..


प्राणोपासक कहते हैं—‘प्राण ही जगत् का कारण है ।’ भूतज्ञों (प्रत्यक्षवादी चार्वाकादि)-का कथन है—‘[पृथिवी आदि] चार भूत ही परमार्थ हैं ।’ गुणों को जाननेवाले [सांख्यवादी] कहते हैं—‘गुण ही सृष्टि के हेतु हैं ।’ तथा तत्त्वज्ञ (शैव) कहते हैं—‘[आत्मा, अविद्या और शिव—ये तीन] तत्त्व ही जगत् के प्रवर्तक हैं’ ॥ २० ॥