वेदा इति वेदविदो यज्ञा इति च तद्विदः ।
भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति च तद्विदः ॥ २२ ॥
भोक्तेति च भोक्तृविदो भोज्यमिति च तद्विदः ॥ २२ ॥
vedā iti vedavido yajñā iti ca tadvidaḥ .
bhokteti ca bhoktṛvido bhojyamiti ca tadvidaḥ .. 22 ..
वेदज्ञ कहते हैं—‘ऋगादि चार वेद ही परमार्थ हैं ।’ याज्ञिक कहते हैं—‘यज्ञ ही संसार के आदिकारण हैं ।’ भोक्ता को जाननेवाले भोक्ता की ही प्रधानता बतलाते हैं तथा भोज्य के मर्मज्ञ (सूपकारादि) भोज्यपदार्थों की ही सारवत्ता का प्रतिपादन करते हैं ॥ २२ ॥