स्थितिरिति स्थितिविदः सर्वे चेह तु सर्वदा ॥ २८ ॥
sṛṣṭiriti sṛṣṭivido laya iti ca tadvidaḥ .
sthitiriti sthitividaḥ sarve ceha tu sarvadā .. 28 ..
प्राण बीजस्वरूप प्राज्ञ को कहते हैं । उपर्युक्त स्थितिपर्यन्त सब विकल्प उसी के कार्यभेद हैं । सम्पूर्ण प्राणियों से परिकल्पित अन्य सब लौकिक धर्म रज्जु में सर्प के समान उन विकल्पों से शून्य आत्मा में आत्मस्वरूप के अनिश्चय के कारण अविद्या से कल्पना किये गये हैं—यह इन श्लोकों का समुदायार्थ है । प्राणादि श्लोकों के प्रत्येक पदार्थ के व्याख्यान का अत्यन्त अल्प प्रयोजन होने के कारण तथा वे सिद्ध पदार्थ हैं—इसलिये प्रयत्न नहीं किया ॥ २८ ॥
[ * ]: प्रधान, महत्तत्त्व, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच विषय और मन—ये सांख्यवादियों के पच्चीस तत्त्व हैं; योगी इनके सिवा छब्बीसवाँ तत्त्व ईश्वर मानते हैं और पाशुपतों के मत में इन पच्चीस तत्त्वों के अतिरिक्त राग, अविद्या, नियति, काल, कला और माया—ये छः तत्त्व और हैं ।