वैतथ्य प्रकरण - कारिका 29

यं भावं दर्शयेद्यस्य तं भावं स तु पश्यति ।
तं चावति स भूत्वासौ तद्ग्रहः समुपैति तम् ॥ २९ ॥

yaṃ bhāvaṃ darśayedyasya taṃ bhāvaṃ sa tu paśyati .
taṃ cāvati sa bhūtvāsau tadgrahaḥ samupaiti tam .. 29 ..


[गुरु] जिसे जो भाव दिखला देता है वह उसी को आत्मस्वरूप से देखने लगता है तथा इस प्रकार देखनेवाले उस व्यक्ति की वह भाव तद्रूप होकर रक्षा करने लगता है । फिर उस (भाव)-में होनेवाला अभिनिवेश उस [-के आत्मभाव]-को प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥
जिसका आचार्य अथवा कोई अन्य आप्त पुरुष जिसे प्राणादि में से किसी कहे हुए अथवा किसी बिना कहे हुए अन्य भावको भी ‘यही परमार्थतत्त्व है’ इस प्रकार दिखा देता है वह उसी भावको आत्मभूत हुआ देखता है [और समझता है कि—] ‘मैं यही हूँ’ अथवा ‘यही मेरा स्वरूप है’ । तथा उस द्रष्टाकी भी, जो भाव उसे दिखलाया गया है, तद्रूप होकर रक्षा करता है; अर्थात् उसे सब प्रकार अपने स्वरूपसे निरुद्ध कर देता है । उसी भावमें जो ग्रह—आग्रह अर्थात् ‘यही तत्त्व है’ इस प्रकारका अभिनिवेश है वह उस भावके ग्रहण करनेवालेको प्राप्त होता है, अर्थात् उसके आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाता है ॥ २९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
प्राणादीनामन्यतममुक्तमनुक्तं वान्यं भावं पदार्थं दर्शयेद्यस्याचार्योऽन्यो वा स इदमेव तत्त्वमिति स तं भावमात्मभूतं पश्यत्ययमहमिति वा ममेति वा । तं च द्रष्टारं स भावोऽवति यो दर्शितो भावोऽसौ भूत्वा रक्षति । स्वेनात्मना सर्वतो निरुणद्धि । तस्मिन्ग्रहस्तद्ग्रहस्तदभिनिवेशः । इदमेव तत्त्वमिति स तं ग्रहीतारमुपैति । तस्यात्मभावं निगच्छतीत्यर्थः ॥ २९ ॥